पृष्ठ:सप्तसरोज.djvu/७१

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नमकका दारोगा
 

दीनता से वोले, बाबू साहब, ईश्वर के लिये मुझपर दया कीजिये में पच्चीस हजारपर निपटारा करने को तैयार हूँ।

"असम्भव बात है।"

"तीस हजार पर? "

"किसी तरह भी सम्भव नहीं?"

"क्या चालीस हजार पर भी नहीं?"

"चालीस हजार नहीं, चालीस लाखपर भी असम्भव है। बदलू सिंह। इस आदमी को अभी हिरासतमें ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।"

धमने धनको पैरोंतले कुचल डाला। आलोपीदीन ने एक हष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकडियां लिये हुए अपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश, कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद यका- यक मूर्छित होकर गिर पड़े।

दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी। सबेरे ही देखिये तो बालक वृद्ध सबके मुंह से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिये वही पण्डितजी के इस व्यवहारपर टीका टिप्पणी कर रहा था, निन्दाकी बौछारें हो रही थीं, मानो संसारसे अब पाप-का पाप कट गया। पानी को दूध के नाम से बेचनेवाला पाला,कल्पित रोजनामचे भरनेवाले अधिकारीवर्ग, रेलमें बिना टिकट सफर करने वाले या लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साहूकार, यह सब के सब देवताओ की भाँति गरी चला रहे थे ।जब दूसरे दिन पण्डित जी अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों में