( १७४ ) लेनिन ने जबाब दिया था कि यह विकल्प मिथ्या है । किसी भी जीपति का पक्ष मत ला, बल्कि अपनी शक्तियों का एकीकरण करके जनता की सत्ता स्थापित करो' । यह बाईस साल से कुछ पहिले की बात है" । सन् १६४० में, युद्ध का स्वरूप निर्धारित करने के लिए साम्यवादी लोग पालियामेंटीय जनतन्त्र और फासिज़न में कोई भेद नहीं करते थे। परन्तु श्री० विकटर गोलेन ने यह विचार रक्खा कि फासिज़्य का अभ्युदय एक नवीन नत्व है जिस पर ध्यान देना चाहिए । वर्तमान युद्ध फामिस्ट विरोधी युद्ध है और १६१४-१८ के नारे इसके ऊपर लागू नहीं होते । जर्मन-सोवियत समझौते पर हस्ताक्षर होने पूर्व साम्यवादी पार्टियों का भी यही मन था। 'तुम कहाँ जा रहे हो ?' शीर्षक एक म्बुली चिट्ठी में जो उसने साम्यवादियों के नाम लिखी थी, विक्टर गोलेंज ने अपने ननिक पहिले के सहयोगियों को बताया : - न इस बात का पंचमात्र इशारा था कि यदि रूस हमारा पक्ष नहीं लेगा तो हम हिटलर के सम्मुम्ब झुक जायंगे, अयवा हम टोग (अनुदारदलीय) नेतृत्व में लड़ने मे इकार करेंगे। इसके विपरीत अावाज यह थी कि चेम्बरलेन कभी हिटलर के सम्मुख खड़ा नहीं हो सकना; और लोगों की दृष्टि की ईडिन, की विमटन चर्चिल, और कभी इफ. कुपर की ओर जाती थी, केवल इस श्राशा और विश्वास मे कि वे हिटलर के विरुद्ध खड़े हो सकेंगे। यथार्थ में, जैसे जैसे ममय बीतता गया, हम टोरियों से अधिकाधिक मी प्रकार से अपील करने लगे। जो कुछ माम्यवादी लोग हिटलरी फामिज़्म के खतरे के बारे में 'लोकप्रिय मोर्च' (Topular Iront) के दिनों में कहा करते थे, उसके आधार पर विक्टर गोलेज ने उनसे अपने नवीन
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