"हिटलर ने एक बार फिर अपने दावे को दुहराया कि युद्ध ब्रिटेन ने उसके ऊपर लादा है। इस ऐतिहासिक तथ्य का कोई उत्तर नहीं। ब्रिटेन ने युद्ध-घोषणा की थी जर्मनी ने नहीं । युद्ध को समान करने के प्रयत्न किये गये, परन्तु सोवियत-जर्मन शान्ति-सन्देशों को ब्रिटेन ने ठुकरा दिया । इन पिछले सब महीनों में युद्ध बन्द करना ब्रिटिश और फ्रांसीसी सरकारों के हाथ में रहा है । परन्तु उन्होंने उसकी अवधि बढ़ाने का मार्ग चुना है।" साम्यवादियों की यह नई नीति और उनकी नितान्त अवसर- वादिता केवल इस आधार पर ससझ में श्रा सकती है कि सोवियत कम एक बड़े युद्ध से दूर रहने के लिए उत्सुक था और उसने सोवियत जर्मन समझौते के द्वारा उस समय के लिए, तो अपना यह उद्देश्य सिद्ध कर लिया था। अतः माम्यवादियों के लिए यह आवश्यक था कि वे उक्त समझौते को मङ्कट में डालने वाला कोई कार्य न करें। इसलिए, वे अपनी गतिविधि सरल और एकसी नहीं रस्त्र सकते थे। यह भी निश्चित है कि यदि वह समझौता न होता, नो युद्ध फासिस्ट-विरोधी बताया जाता और संसार के श्रमिकों से अपील की जाती कि वे मित्रराष्ट्रों की अोर रहें । हम उचिन स्थान पर युद्ध के प्रति साम्यवादी नीति के प्रमुख हेर-फेरों की विस्तृत विवेचना करेंगे । इस समय इतना कहना पर्याप्त है कि जर्मन-सोवियत समझौते के पश्चात् साम्यवादियों के हाथ, युद्ध- विरोधी दिशा पकड़ने के लिए खुल गये। हाँ श्री गोलेंज हिटलर के विरुद्ध अपना बुर्जुया सरकार का पक्ष लेने और इस प्रकार पश्चिमीय जनतन्त्र और सभ्यता को नष्ट होने से बचाने की अपनी पुरानी लकीर पर चलते रहे । अपनी बात की पुष्टि में उन्होंने
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