लार्ड सभा में बारन हेस्टिंग्ज पर जो अभियोग चलाया गया था, उसने अवध की वेगमों को लूटना उसके ऊपर लगाये गये प्रमुख अारोपों में से एक था और हम अब भी उसके विषय में बर्क, फाक्स और शेरीडन के अोजपूर्ण भाषणों और मेकाले के लेख में से पढ़ सकते हैं । एक अन्य अवध की बेगम सन् १८५७ के गदर के सबसे अधिक दृढ़पतिज्ञ नेताओं में से थी, और उसने सन् १८५८ के महारानी विक्टोरिया के ऐलान का जो ललकारपूर्ण उत्तर दिया था, उसका हमारे क्रान्तिकारी साहित्य में ऊँचा स्थान है । अवध के एक दूरदर्शी शासक ने एक भव्य मकबरा बनवाया था, जिसमें उसके वश के अनेक नवाबों और बेगमों को अन्तिम शान्ति मिली है। वह अवध में गुल-वाड़ी के नाम से प्रसिद्ध है। जिस सड़क पर वह अवस्थित है, वह अाजकल प्राचार्य नरेन्द्रदेव रोड कहलाती है। यद्यपि प्राचार्यजी बामपक्ष के नेता हैं, परन्तु सभी, यहां तक कि उनके राजनीतिक विरोधी भी उनका आदर करते हैं। इसका कारण उनकी दयालु प्रकृति और परपक्ष के प्रति न्याय करने की भावना है । पार्टी के भेदभावों को वैयक्तिक सम्बन्धों के बीच में नहीं श्राने देते। उनके अति खण्डनात्मक कथनों में भी कटुता का लेश नहीं होता। जब वे श्रापसे मतभेद करेंगे, यो इतनी नमूता और शिष्टता से करेंगे कि आपको उनकी बात बिलकुल लगेगी नहीं। श्राचार्यजी भारत के महान् वक्ताओं में से एक हैं । ऐसे कुछेक व्यक्तियों के नाम सोचना भी कठिन है जिनमें उनकी सी प्रगाढ़ विद्वत्ता और प्रौढ़ व्याख्यान शक्ति का समन्वय हो । परन्तु ने इतने सङ्कोचशील हैं कि सन् १९२४ तक वे कांग्रेस में एक बार भी नहीं बोले, यद्यपि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य ने १६१७
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