कृषक और भारतीय क्रान्ति [१] भारतीय कृपक भारतीय किसान की कष्ट सहने की असीम क्षमता विख्यात है। उसके धैर्य का पार नहीं । जिन शारीरिक और नैतिक अवस्थाओं में वह रहता है, वे अवर्णनीय है। पीढ़ी दर पीढी उसके ऊपर अनेक अत्याचार होते रहे है। समाज की अन्य सभी श्रेणियो- भूमिपत्तियो, बोहरो, व्यापारिया, पण्डे-पुजारियों और राजकर्मचारियों का भार उसे वहन करना पड़ा है । परन्तु इतने पर भी वह सामान्यतः मृक रहा है, केवल जब यन्त्रणा अत्यधिक असहनीय हो उठी है, तब उसके क्रोध का ज्वालामुखी विप्लव के रूप में फट निकला है। ऐसे स्थानीय विद्रोह कृपक इतिहास मे अगणित हुए है, परन्तु उनका फन उसे दूने का और क्रूरता के रूप मे मिला है । राष्ट्रीय कृषक-विप्लव कन और दीर्घकाल के अन्तर से और यद्यपि वे बड़े पैमाने पर संचालित किये गये, परन्तु तो भी उनका अन्त या तो क्षणिक राजनीतिक सत्ता-प्राप्ति के उपरान्त पराजय मे हुआ, अथवा ऐसे मामूली सुधागे में जो राज्य नियमी और शासन मे उसका विश्वास पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक थे। फ्रेंच क्रान्ति मे सामन्त- शाही को पछाड़ने के लिए कृपको ने मध्यवर्गीय नगर-निवासियों का साथ दिया था, परन्तु उसके पुरस्कार स्वरूप उनके हित में जो कुछ किया गया वह ऋणात्मक ( negative ) ढंग का था। उन्हें सामन्तों की दासता से तो मुक्ति मिल गई, परन्तु अपना परिश्रम किसी के भी हाथ वेधकर
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