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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्ग- की नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रों- में ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो । परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्याय- पीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण- अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन

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किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त ( लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। इंडियन ओपिनियन, १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।

१. देखिए परिशिष्ट १९ ।

२. सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व ( इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके " न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।