टॉल्स्टॉय फार्म
अगस्त ४, १९१२
प्रिय श्री गोखले,
आपकी लम्बी चिट्ठीके' लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! अभी आप बीमारीसे उठे ही हैं, इसलिए मैं सपने में भी यह नहीं चाहूँगा कि आपको जिस परहेज और आरामकी जरूरत है उसकी उपेक्षा करके आप यहाँ आयें। वैसे मेरा खयाल यह है कि आप दक्षिण आफ्रिकाके लिए रवाना होनेसे पहले बिलकुल अच्छे हो जायेंगे। यदि आपकी सहमति हो तो मोटे तौरपर कार्यक्रम इस प्रकार रख लिया जाये : २२ और २३ अक्तूबर केप टाउन, २५ और २६ किम्बर्ले, २७ जोहानिसबर्ग। ज्यादातर वक्त तो जोहानिसबर्ग में ही बीतेगा। दो दिन प्रिटोरियाको दिये जा सकते हैं। मैं सोचता हूँ, यदि आप तार द्वारा अन्यथा आदेश न दें तो जनरल बोथा और श्री फिशरसे आपकी अगवानी करनेका अनुरोध करूँ। यदि उस समय तक लॉर्ड ग्लैडस्टन वापस आ जाते हैं, तो मैं उनसे भी कहने की बात सोचता हूँ। श्री मेरीमैनसे' तो मैं आपका स्वागत करनेको कहूँगा ही। वे दक्षिण आफ्रिका के सबसे बड़े राजनयिक हैं। मैंने ऊपर जिन स्थानोंके नाम दिये हैं, उन सभी स्थानोंमें आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किये जायेंगे। जोहानिसबर्ग में एक मिले-जुले प्रीतिभोजका आयोजन करनेका भी विचार है। अध्यक्षता शायद महापौर महोदय करेंगे। अपने प्रवासका अन्तिम सप्ताह आप फीनिक्स, डर्बनमें बितायेंगे। और
१. जुलाई २७, १९१२ का पत्र देखिए परिशिष्ट २० ।
२. अब्राहम फिशर; दिसम्बर १९०७ से मई १९१० तक ऑरेंज रिवर कॉलोनी के प्रधान मन्त्री; सन् १९१० में दक्षिण आफ्रिका संघके निर्माणके बाद संघ सरकारके भूमि-मन्त्री ( यूनियन मिनिस्टर फॉर लैंड्स )। सन् १९१२ में प्रतिरक्षा विधेयकके पास होनेपर जनरल स्मटसने गृह मन्त्रालय छोड़ दिया और वित-मन्त्रालयका दायित्व सँभाला, हालाँकि प्रतिरक्षा और खनिज मामलोंकी जिम्मेवारी तब भी उन्होंने अपने ही हाथमें रखी। नई व्यवस्थामें जनरल बोधाने गृह मन्त्रालयका दायित्व स्मट्ससे लेकर श्री फिशरको दिया। संघ-संसद में १९१३ का प्रवासी विधेयक फिशरने ही पेश किया।
३. जॉन जैवियर मेरीमैन; इनका जन्म इंग्लैंडमें हुआ था, किन्तु इन्होंने दक्षिण आफ्रिकाको ही अपना देश बना लिया था। प्रतिष्ठित और सफल संसद सदस्य; रोडसके पहले मन्त्रिमण्डलमें राजकोष मन्त्री(ट्रेजरर ); सन् १९०८-१० में केप कालोनीके प्रधान मन्त्री; संघके निर्माणके बाद प्रधानमन्त्री पदके लिए जनरल बोथाके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी १९०९ में गांधीजी शिष्टमण्डल लेकर जिस जहाजसे इंग्लैंड जा रहे थे, उसी जहाजसे ये भी इंग्लैंड जा रहे थे। गांधीजीको इनका रुख भारतीयोंके प्रति बड़ा सहानुभूतिपूर्ण जान पड़ा था। और इन्होंने भारतीयोंको सहायता देनेका भी वचन दिया था; परन्तु बादमें वे उसे निभा नहीं सके। देखिए खण्ड ९ पृष्ठ २७२, २७७ और ३०५ तथा इंडियन ओपिनियन, स्वर्ण-अंक; दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास, अध्याय ५ और ३२ भी ।