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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/२४१

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पत्र : उपनिवेश-सचिवको

हेर-फेर के बरकरार है। जहाँतक " बड़ा व्यापार करनेवाले" एशियाई व्यापारियका सम्बन्ध है, उनके शहरोंमें रहने दिये जानेके निवेदनपर विचार किया जा सकता है। परन्तु ऐसे वर्गके कोई लोग इस समय प्रिटोरियामें नहीं हैं; इसलिए यह हुक्म बरकरार है कि प्रिटोरियामें अभी मौजूद सब एशियाइयोंको पृथक् बस्तियोंमें रहना होगा। सैनिक गवर्नरने कृपाकर यह अनुमति दे दी है कि दो आदमी " मसजिद ” की हिफाजत करनेके लिए उसमें रह सकते हैं। आज मैंने सब एशियाइयोंको, जो इस समय नगर में रह रहे हैं, पृथक बस्तीमें चले जाने और वहीं रहनेका आदेश दे दिया है।

(हस्ताक्षर ) जे० ए० गिलम

१३०. पत्र : उपनिवेश सचिवको

१४, मर्क्युरी लेन
डर्बन
अप्रैल ३०, १९०१

सेवा में
माननीय उपनिवेश-सचिव
पीटरमैरित्सवर्ग
श्रीमन्,

मैं इस सप्ताहके सरकारी गजटमें प्रकाशित भारतीय प्रवासी अधिनियम संशोधन विधेयकपर आपको लिखने की धृष्टता कर रहा हूँ।

विधेयकके पहले खण्डमें कहा गया है कि किसी भी भारतीय स्त्रीको १८९५ के कानूनके अनुसार जिस दरसे मजदूरी दी जायेगी वह उस कानून में बताई हुई दरकी आधी होगी। या फिर, ऐसी विशेष दरसे दी जायेगी, जो मालिक और उस स्त्रीके बीच तय हो जाये। मैं मानता हूँ कि सरकारका इरादा यह है कि १८९५ के कानून में बताई गई दरको आधी दर कमसे कम हो । परन्तु मेरा खयाल है कि उक्त खण्डके शब्दोंसे यह इरादा काफी स्पष्ट नहीं होता। क्या मैं सुझा सकता हूँ कि उसमें ये शब्द जोड़ दिये जायें --" परन्तु किसी भी हालत में यह दर पूर्वोक्त दरकी आधीसे कम न होगी।

मैं आपका ध्यान इस तथ्यकी ओर खींचने की इजाजत लेता हूँ कि १८९१ के कानून २५ में भारतीय स्त्रीकी मजदुरी पुरुषोंकी मजदूरीसे आधी निश्चित की गई है। मुझे आशा है कि सरकार न्यूनतम दरमें कोई फर्क करना नहीं चाहती।

आपका आज्ञाकारी सेवक,
मो० क० गांधी

[अंग्रेजीसे]

पीटरमैरित्सबर्ग आर्काइव्ज, सी० एस० ओ० ३४८६/१९०१ |


१. सुझाव मंजूर कर लिया गया था ।