सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/५१६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

४७४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय सूतकके नियमोंका पालन इतनी सावधानीसे किया जाता है कि अगर कोई जहाज एक जापानी बन्दरगाहसे दूसरे जापानी बन्दरगाहमें भी जाता है, तब भी उसके खलासियोंकी जाँच इन्हीं नियमोंके अनुसार होती है । [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, १०-९-१९०३ ३३६. विक्रेता-परवाना अधिनियम पुनरुज्जीवित : २ अगली जनवरी में परवानोंको नया करवाना होगा। इस सम्बन्धमें नेटालके ब्रिटिश भारतीयोंकी किस्मतमें क्या-क्या बदा है इसकी कुछ पूर्व-सूचना न्यूकैसिल और डर्बनकी नगर- परिषदोंके निर्णयोंसे मिल सकती है। अगले वर्ष भी उन सारी बातोंके अपने सम्पूर्ण भद्देपनके साथ दोहराये जानेकी आशा है, जो सन् १८९८ में हुई थीं । अतः इस वर्ष में भारतीयोंको अपने परवानोंके सम्बन्धमें किन-किन कठिनाइयोंका सामना करना पड़ा, इसका सिंहावलोकन कर लेना अनुचित नहीं होगा । तब इस हलचलका नेतृत्व न्यूकैसिलकी नगर परिषदने किया था । संयोगकी बात है कि इस वर्ष भी वही अग्रभागमें है । जैसा कि किसी पिछले अंकमें हम बता चुके हैं, सन् १८९८ में न्यूकैसिलमें परवाना अधिकारीने तमाम ब्रिटिश भारतीयोंको शुरू-शुरूमें परवाने जारी करनेसे इनकार कर दिया था । अन्यायके शिकार बने व्यापारियोंको बहुत भारी फीस देकर वकील करना पड़ा था। परिणाम यह हुआ था कि नौमें से छ: के परवाने नये करनेकी आज्ञा नगर परिषदने दे दी थी। पाठकोंको याद होगा कि इसपर मामला सम्राट्की न्याय परिषद (प्रीवी कौन्सिल) को यह निर्णय लेनेके लिए भेजा गया था कि विक्रेता- परवाना अधिनियमके मातहत नगर परिषदके निर्णयपर अपील सुननेका अधिकार उपनिवेशके सर्वोच्च न्यायालयको है या नहीं। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीशने निर्णय दिया कि सर्वोच्च न्यायालयको यह अधिकार है; परन्तु सम्राट्की न्याय परिषदने ब्रिटिश भारतीयोंके विरुद्ध निर्णय दिया । इस अपीलमें भारतीयोंका ६०० पौंडसे भी अधिक खर्च लगा, परन्तु इस सबका नतीजा यह निकला कि श्री चेम्बरलेन तथा विधान-निर्माताओंने महसूस किया कि अपीलका अधिकार छीन लेनेमें बड़ी भूल हुई है। अतः सरकारने नगर-परिषदों और स्थानिक निकायोंको गश्ती सूचनाएँ भेजीं कि उन्हें अपने अधिकारोंका उपयोग बहुत विवेकपूर्वक और उचित तरीकेसे करना चाहिए एवं निहित स्वार्थीका पूरा ध्यान रखना चाहिए; अन्यथा कानूनपर पुनर्विचार करना पड़ेगा। इसका कुछ समयके लिए तो अभीष्ट परिणाम हुआ । फलतः अभीतक गाँवों और बहुत दूरकी जगहोंको छोड़कर परवानोंको नया करवाने में कहीं कोई कठिनाई अनुभव नहीं हुई। डर्बन नगर परिषदके कुछ सदस्योंने तो कानूनके प्रति अपनी नापसन्दगी भी जाहिर की और परवाना अधिकारियों द्वारा बरते जानेवाले पक्षपातकी निन्दा भी की। श्री कॉलिन्स उनमें से एक थे। श्री लैबिस्टरने, जो आज महान्यायवादी (अटर्नी जनरल) हैं, जब वे नगर- परिषद में थे, अधिक कड़े शब्दोंमें अपने विचार प्रकट किये थे और कहा था कि नगर परिषदोंसे अपेक्षा की जाती है कि वे केवल रंगके बहाने परवाने देनेसे इनकार कर दें। यह " काम गन्दा है । उन्होंने सुझाव दिया कि अगर विधानमण्डलकी यह इच्छा है कि ऐसा काम किया जाये तो वह इस दिशामें ईमानदारीसे कानून बना दे और नगर परिषदोंके करनेके लिए यह गन्दा काम न छोड़े। परन्तु अब इस गश्ती-सूचनाका असर पूर्णतया नष्ट हो चुका है। स्थिति " Gandhi Heritage Portal