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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 3.pdf/५१७

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मजदूरोंकी जबरन वापसी ४७५ अत्यन्त गम्भीर है। इस संकटके निवारणके लिए भारतीयोंको अपनी सम्पूर्ण शक्ति बटोर लेनी होगी। गत दिसम्बर में जब श्री चेम्बरलेन यहाँ आये थे तब उन्होंने कहा था कि जो भारतीय पहलेसे ही उपनिवेशमें बस गये हैं, उनके साथ सम्मानपूर्ण और उचित व्यवहार होगा । श्री चेम्बरलेनका समर्थन करते हुए सर आल्बर्ट तो यहाँतक कह गये कि विक्रेता परवाना कानून दोषपूर्ण है, क्योंकि उसमें अपीलका अधिकार छीन लिया गया है। हम असंख्य बार कह चुके हैं कि उपनिवेशियोंकी भावनाओंका खयाल रखते हुए नगर- परिषदें विक्रेता-परवानोंके प्रश्नके विषयमें जैसे उचित समझें, नियम बना लें; परन्तु यह ध्यान रखें कि उनमें मनमानी न होने पाये और विरोधका आधार केवल रंग न हो। अगर वस्तु भण्डार आसपासकी इमारतोंके बीच फबने जैसे नहीं हैं, तो नगर परिषदें ऐसा साफ-साफ कह दें और नये मकान बनानेपर जोर दें। अगर खुद अर्जदारमें ही कोई दोष हो तो उसे बुलवाकर यह बता दिया जाये और उसे दुरुस्त करनेके लिए कहा जाये । परन्तु सारी आवश्यक शर्तोंकी पूर्ति हो जानेपर भी अगर किसीको केवल इसलिए व्यापार करनेसे रोका जाता है कि उसकी चमड़ीका रंग गोरा नहीं है, तो यह एक बहुत भारी अन्याय है । कलमकी एक रगड़मात्रसे निर्दोष और निरपराध व्यापारियोंकी रोजी छीन लेना उचित और सम्माननीय व्यवहार तो नहीं कहा जा सकता। हमारी रायमें इसका एक ही उपाय है । सो यह कि, सर्वोच्च न्यायालयको अपील सुननेका अधिकार दे दिया जाये, जो कि अवैधानिक रूपसे अभी छीन लिया गया है। इस बातके लिए हम बहुत कृतज्ञ हैं कि सारे ब्रिटिश उपनिवेशों में सर्वोच्च न्यायालय सदा शुद्ध रहे हैं और गरीबसे गरीब ब्रिटिश प्रजाजन आशा कर सकते हैं कि वहाँ बगैर किसी प्रकारके पक्षपात या द्वेषके शुद्ध न्याय मिल सकता है। ये न्यायालय जनताकी स्वतन्त्रताके सबसे बड़े आधार हैं और जबतक विधान मण्डल सर्वोच्च न्यायालयको परवाना-अधि- कारियोंके कार्योंपर दिये गये नगर परिषदोंके निर्णयोंकी अपील सुनने और प्रत्येक मामलेके गुण- दोषोंको तोलकर निर्णय देनेका अधिकार पुनः नहीं दे देते, तबतक भारतीय व्यापारियोंको कभी चैन नसीब नहीं हो सकती, और तबतक तमाम न्यायप्रिय और निष्पक्ष व्यक्तियोंकी नजरमें विधानसभाका रुख निन्दनीय ही बना रहेगा । [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, १७-९-१९०३ ३३७. मजदूरोंकी जबरन वापसी यद्यपि आयोग ऐसा कानून बनानेकी कोई सिफारिश नहीं की कि अगर भारतीय अपने गिरमिटकी अवधि पूरी होने के बाद नया इकरार करनेको तैयार न हों तो उन्हें भारत लौटनेके लिए बाध्य किया जाये, फिर भी में ऐसे किसी भी विचारकी जोरोंसे निन्दा करता हूँ। मेरा पक्का विश्वास है कि आज जो अनेक लोग इस योजनाकी हिमायत कर रहे हैं वे सब समझेंगे कि इसका अर्थ क्या होता है तब वे भी मेरे समान ही जोरोंसे इसे ठुकरा देंगे। भले ही भारतीयोंका आना रोक दीजिए और उसका फल भोगिए, परन्तु ऐसा कुछ करनेकी कोशिश मत कीजिए जो, मैं साबित कर सकता हूँ, भारी अन्याय है । यह इसके सिवा क्या है कि हम अपने अच्छे और बुरे दोनों तरहके नौकरोंका ज्यादासे ज्यादा लाभ उठा लें और जब उनकी अच्छीसे-अच्छी उम्र हमें फायदा Gandhi Heritage Portal