पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/१०१

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

iki des WAT (२४) राजों के राज्य, राजधानियों को राजधानियाँ नष्ट हो जाना पवित्रता हू कि देवी के पास आन हाथी की मस्ती खुल गई। उनके चरणों में नमस्कार की और चल दिया। जब कभी मेरा हृदय विक्षिप्त होता है, मैं यहां आनकर इस देवी के चरणों की रज को ले अपने मस्तक और नाभि, दिल और चक्षु और सिर में लगा पवित्र करता हूँ। नाश गई वह तख्त जिस पर बैठते थे तख्ते हो गए, मिट्टी में मिल गए परन्तु समय के प्रभाव को देखिए-सब भारतवर्ष की महारानी नूरजहाँ रावी नदी के किनारे लाहौर शहर के उस तरफ मामूली धरती की गुफा में लेटी है, कभी २ उठकर एक निगाह इस सारे देश पर करती है । सबज़ काही रोज़ जा जाकर उसके चरणों पर नमस्कार करती है । ग्रीष्म ऋतु, रंग विरंग के पत्ते इसके ऊपर बरसाती है। वसंत ऋतु जब कभी आती है उसके सिर पर फूलों की बपी करती है। इस भारत की महा- रानी के स्थान की यात्रा यहाँ बान होती है। मुझे आप आशीर्वाद देते हैं । और अपनी मलका का दर्शन कर मैं अजीब भावो से भर अपने पुत्व पाठक के मुख को देखता हूँ। (२५) वह कौन बैठे हैं ! कमल के फूल का सिंहासन है, उस पर पद्मासन लगाये निर्वाण समाधि में लीन, कपिलवस्तु का राजा राजकुमार बैठा है। जगत् को जीत चुका है। राजों का राजा है। बुद्ध के पत्थर के गढ़े चित्र तो कैई देखे, वे भी अद्भुत हैं पर शाक्यमुनि बुद्ध आप सबसे अद्भुत हैं । दर्शन दुर्लभ तो नहीं, वह रुकते तो नहीं, उनको तुम्हारी खबर भी नहीं। पर दीदार खुले होते हैं, जहाँ बुद्धजी का चित्र है, वह मन पवित्र है, स्थान पवित्र है । (२६) एक किसी गाँव की गली है, किसान लोग रहते हैं, वह कौन आया ! जिसे देखने सब के सब नर नारी बालक बाहर निकल देखने आए । नीली २ विभूति रमाए एक हाथ में मिक्षा- पात्र, दूसरे हाथ में पार्वती को पकड़े साक्षात् शिव पार्वती; आ रहे ।

  • W***