पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/१२३

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आचरण की सभ्यता और उस समय फिर एक बार अपवित्र न होते तो सूरसागर में प्रेम का वह मौन व्याख्यान-आचरण का वह उत्तम अादर्श कैसे दिखाई देता । कौन कह सकता है कि जीवन की पवित्रता और अपवित्रता के प्रतिद्वन्द्वी भाव से संसार के प्राचरणों के [की एक अद्भुत पवित्रता का विकास नहीं होता !" यदि मेरोमाडलिन वेश्या न होती तो कौन उसे ईसा के पास ले जाता और ईसा के मौन व्याख्यान के प्रभाव से किस तरह आज वह हमारी पूजनीया माता बनती ? कौन कह सकता है कि ध्रुव को सौतेली माता अपनो कठोरता से ध्रुव को अटल बनाने में वैसी ही सहायक नहीं हुई जैसी की स्वयं ध्रुव की माता iV मनुष्य का जीवन इतना विशाल है कि उसके प्राचरण को रूप देने के लिये नाना प्रकार के ऊँच नीच और भले बुरे विचार; अमीरी और गरीबी, उन्नति और अवनति इत्यादि सहायता पहुँचाते हैं। पवित्र अपवित्रता उतनी ही बलवती है, जितनी कि पवित्र पवित्रता । जो कुछ जगत् में हो रहा है वह केवल आचरण के विकास के अर्थ हो रहा है। अन्तरात्मा वही काम करती है जो बाह्य पदार्थों के संयोग का प्रतिबिम्ब होता है। जिनको हम पवित्रात्मा कहते हैं, क्या पता है, किन किन कूपों से निकल कर वे अब उदय को प्राप्त हुए हैं ? जिनको हम धर्मात्मा कहते हैं, क्या पता है, किन किन अधर्मों को करके वे धर्म-ज्ञान को पा सके हैं ? जिनको हम सभ्य कहते हैं और जो अपने जोवन में पवित्रता को ही सब कुछ समझते हैं, क्या पता काल पूर्व बुरी और अधर्म अपवित्रता में लिप्त रहे हों ? अपने जन्म- जन्मान्तरों के संस्कारों से भरी हुई अंधकार-मय कोठरी से निकलकर ज्योति और स्वच्छ वायु से परिपूर्ण खुले हुए देश में जब तक अपना अाचरण अपने नेत्र न खोल चुका हो तब तक धर्म के कैसे समझ में आ सकते हैं। नेत्र-रहित को सूर्य से क्या लाभ ? हृदय- रहित को प्रेम से क्या लाभ ? बहरे को राग से क्या लाभ ? कविता, वे कुछ गूढ़ तत्त्व १२३