पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/१२६

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अाचरण की सभ्यता सिद्धि ही क्या हो सकती है ? जब तक किसी जहाज के कप्तान के हृदय में इतनी वीरता भरी हुई है कि वह महाभयानक समय में भी अपने जहाज को नहीं छोड़ता तब तक यदि वह मेरी और तेरी दृष्टि में शराबी और स्त्रैण है तो उसे वैसा ही होने दो। उसकी बुरी बातों से हमें प्रयोजन ही क्या ? आँधी हो-बरफ हो -बिजली की कड़क हो-समुद्र का तूफान हो-वह दिन रात अॉख खोले अपने जहाज की रक्षा के लिये जहाज के पुल पर घूमता हुआ अपने धर्म का पालन करता है । वह अपने जहाज के साथ समुद्र में डूब जाता है; परन्तु अपना जीवन बचाने के लिये कोई उपाय नहीं करता । क्या उसके आचरण का यह अंश मेरे-तेरे बिस्तर और आसन पर बैठे बिठाये कहे निरर्थक शब्दों के भाव से कम महत्त्व का है ? न मैं किसी गिरजे में जाता हूँ और न किसी मन्दिर में; न मैं नमाज पढ़ता हूँ और न रोजा ही रखता हूँ, न संध्या ही करता हूँ और न कोई देवपूजा ही करता हूँ; न किसी प्राचार्य के नाम का मुझे पता है और न किसी के आगे मैने सिर ही झुकाया है। तो इससे प्रयोजन हो क्या और इससे हानि भी क्या ? मै तो अपनी खेती करता हूँ; अपने हल और बैलों को प्रातःकाल उठकर प्रणाम करता हूँ; मेरा जीवन जंगल के पेड़ों और पत्तियो को सङ्गति में गुजरता है; आकाश के बादलों को देखते मेरा दिल निकल जाता है । मैं किसी को धोखा नहीं देता; हाँ, यदि मुझे कोई धोखा दे तो उससे मेरी कोई हानि नहीं। मेरे खेत में अन्न उग रहा है; मेरा घर अन्न से भरा है; बिस्तर के लिये मुझे एक कमली काफी है, कमर के लिये लंगोटी और सिर के लिये एक टोपी बस है । हाथ-पाँव मेरे बलवान् है; शरीर मेरा अरोग्य है; भूख खूब लगती है; बाजरा और मकई, छाछ और दही, दूध और मक्खन मुझे और मेरे बच्चों को खाने के लिये मिल जाता है। क्या इस किसान की सादगी और सचाई में वह मिठास १२६ ।