पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/२८

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भूमिका पूर्व की विभाजक रेखा है जिसकी स्थिति अंग्रेजी और हिन्दी के निबन्धों के बीच में भी स्वाभाविक है । अंग्रेजी के सर्वप्रथम निबन्धकार बेकन ने भी 'एसे' को बिखरे हुए चिन्तन ( Dispersed medi- tation ) के रूप में माना है । इससे भी यही प्रकट होता है कि व लोग निबन्ध को गम्भीर वस्तु न मानकर चलतो हुईसो शैली' ही मानते हैं किन्तु प्रायः हिन्दीनिबन्धकारों का मन्तव्य ऐसा नहीं है। आचार्य रामचन्द्रशुक्ल ने निबन्ध को गद्य की कसौटी माना है । अधिक बड़ो वस्तु के बँधान में कसावट आ नहीं सकती, इसलिए निबन्ध का श्राकार अनिवार्य रूप से संक्षितता को ओर झुका होता है । वैसे कुछ लोग ४००-५०० पृष्ठों के प्रबन्ध को भी निबन्ध कह देते हैं । किन्तु यह उचित नहीं जचता । वास्तव में लघुकथा की तरह निबन्ध भी एक बैठक में पढ़े जाने योग्य होता है। निबन्ध और प्रबन्ध का अन्तर बहुत कुछ कहानी और उपन्यास के अन्तर जैसा भी समझना चाहिए । बसफोल्ड (Worsfold) ने लिखा है :- “The essay is distinguished by the brevity of its external form and by the presence of the elem- ent of reflection. It treats a subject from a single point of view and permits the personal charac- teristics of the writer to assume a greater prominence than is permitted in the regular and complete treatment of the same subject in a treatise on book." अर्थात् बाह्य आकार की संक्षितता तथा चिन्तनतत्व का समावेश निबन्ध के (प्रबन्ध से) भेदक हैं। इसमें विषय का निरूपण एकांगी होता है तथा लेखक की व्यक्तिगत विशेषताओं के स्फुरण का प्रबन्ध " २८