पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/३१

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यही कारण है कि भारतेंदु युग से लेकर वर्तमान युग के निबन्ध में शायद ही कोई निबन्ध मिल जिसका उद्देश्य व्यक्तित्वचित्रण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हिन्दी निबन्ध कार की आत्मभिव्य्क का सबसे जबरदस्त साधन शैली ही है। उसी के जीने पर्दे में वह अपने आपको छुपा कर प्रकट करते हैं। अपने आकार प्रकार में निबंध कहिनी से बहुत कुछ सी मिलता-जुलता है। कहानी की भांति यह भी एक निश्चित लक्ष्य लेकर चल ह इसका आकार भी वैसा ही छोटा होता है, जिसके कारण इसमें भी कहानी जैसा ही अधूरा पन रहता है जो अपने आपमें पूर्ण होता है। कहानी की तरह निबन्ध भी विशेष के किसी एक अंग पर प्रकाश डालते है या सम्पूण विशेष की एक रूप रेखा प्रस्तुत करते हैं पर उनकी समाप्ति इस ढंग से होती है कि उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव समाप्त विन्दू तक चरम सीमा पर पहुंच जाता है