पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/४४

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भूमिका कुछ तो खाने को मिलेगा। जब वह थक जाती है तब ठहर जाती है । सुई हाथ में लिये हुए है, कमीज घुटने पर बिछी हुई है, उसकी आँखों की दशा उस आकाश की जैसी है जिसमें बादल बरस कर अभी बिखर गये हैं । खुली आँखें ईश्वर के ध्यान में लीन हो रही हैं । कुछ काल के उपरान्त 'हे राम' कह उसने फिर सीना शुरू कर दिया इस माता और बहिन की सिली हुई कमीज मेरे लिये मेरे शरीर का नहीं मेरी अत्मा का वस्त्र है।" इस बात को इस तरह भी कहा जा सकता था कि 'एक दुखी विधवा के हाथ की सिली कमीज मेरी आत्मा का वस्त्र है। किन्तु इससे अभोष्ट प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता था, इसीलिए लेखक ने अपनी प्रतिभा से उस विधवा को निरीह अवस्था में पाठक के सामने लाकर बिठा दिया है, उसकी परिस्थितियों और वातावरण को भी सजीव कर दिया है, इतना सजीव कि काइयाँ से काइयाँ पाठक भी उससे कतरा कर नहीं निकल सकता, पत्थर से पत्थर दिल भी जिसे देख कर रो देगा- 'अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम् । इनके सभी निबन्ध ऐसे चित्रों से भरे पड़े हैं । 'पवित्रता' शीर्षक निबन्ध में यह शैली पराकाष्ठा को पहुँच गयी है । शैली में भावानुकूल मोड़ देने में ये बड़े सिद्धहस्त हैं । वर्णनात्मक प्रसंगों में इनकी शैली बड़ी प्रवाहमयी होती है, वाक्य छोटे-छोटे, प्रभाव डालने के लिए वाक्य और शब्दो के स्थानों में व्यतिक्रम, क्रिया- का लोप आदि अनेक विशेषताएँ वहाँ देख पड़ेंगी- 'एक दफे एक राजा जंगल में शिकार खेलते-खेलते रास्ता भूल गया। उसके साथी पीछे रह गये । घोड़ा उसका मर गया। बंदूक हाथ में रह गई। रात का समय आ पहुँचा । देश बर्फानी, रास्ते पहाड़ी। पानी बरस रहा है। रात अँधेरी है । ओले पड़ रहे हैं। ठंडी हवा उसके हड्डियों तक को हिला रही है।" ४४