पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/६६

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

सच्ची वीरता हिंदुस्तान के सारे अखबारों ने “हीरो” ( Hero) की पुकार मचाई। बस एक नया वीर तैयार हो गया । यह तो पागलपन की लहरें हैं। अखबार लिखनेवाले मामूली सिक्के के मनुष्य होते हैं। उनकी स्तुति और निन्दा पर क्यों मरे जाते हो ? अपने जीवन को अखबारों के छोटे छोटे पैराग्राफों के ऊपर क्यों लटका रहे हो? क्या यह सच नहीं कि हमारे आज कल के वीरों की जाने अखबारों के लेखों में हैं ? जो इन्होने रंग बदला तो हमारे वीरों के रंग बदले, गोठ खुश्क हुए और वीरता की प्राशायें टूट पड़ी। प्यारे, अंदर के केंद्र की ओर अपनी चाल उलटो और इस दिखावटी और बनावटी जीवन की चंचलता में अपने आप को न खो दो । वीर नहीं तो वीरों के अनुगामी हो और वीरता के काम नहीं तो धीरे-धीरे अपने अंदर वीरता के परमाणुओं को जमा करो | .. जब हम कभी वीरों का हाल सुनते हैं तब हमारे अन्दर भी वीरता की लहरें उठती हैं और वीरता का रंग चढ़ जाता है । परन्तु वह चिर- स्थायी नहीं होता। इसका कारण सिर्फ यही है कि हममें भीतर वीरता का मलवा ( Suttle ) तो होता नहीं। सिर्फ खयाली महल उसके दिखलाने के लिये बनाना चाहते हैं । टीन के बरतन का स्वभाव छोड़कर अपने जीवन के केंद्र में निवास करो और सचाई की चट्टान पर दृढ़ता से खड़े हो जाओ। अपनी जिन्दगी किसी और के हवाले करो ताकि जिन्दगी के बचाने की कोशिशों में कुछ भी समय जाया न हो । इसलिए बाहर की सतह को छोड़कर जीवन की अंदर की तहों में घुस जावो; तब नये रंग खुलेंगे। नफरत और द्वैतदृष्टि छोड़ो, रोना छूट जायगा । प्रेम और आनन्द से काम लो; शान्ति की वर्षा होने लगेगी और दुखड़े दूर हो जायेंगे । जीवन के तत्व को अनुभव करके चुप हो जावो; धीर और गम्भीर हो जावोगे । वीरों की, फकीरों की, पीरों की यह कूक है-हटो पीछे, अपने अन्दर जावो, अपने आपको देखो, दुनिया और की और हो जायगी । अपनी आत्मिक उन्नति करो। प्रकाशन काल-पौष-माघ संवत् १९६५ वि० जनवरी-फरवरी सन् १६०६ ई०