पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/८०

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कन्या-दान n कर लेता है कि आध्यात्मिक तौर से पति और पत्नी ने अपने आपको परस्पर दान कर दिया | भारतवर्ष में वैवाहिक आदर्श को इन जाति-पाँति के बखेड़ों ने अब तब कुछ टूटी फूटी दशा में बचा रखा है। कभी कभी इन बूढ़े, हठी और छू छू करनेवाले लोगो को लेखक दिल से आर्य-आदर्श के आशीर्वाद दिया करता है कि इतने कष्ट झेलकर भग्नावशिष्ट भी इन लोगों ने कुछ न कुछ तो पुराने अादशों के अंश नमूने बचा रखे हैं । पत्थरों की तरह ही सहो, खंडहरों के टुकड़ों की तरह ही सही, पर ये अमूल्य चिह्न इन लोगों ने रुई में बाँध बाँधकर, अपनो कुबड़ी कमर पर उठा, कुलियों को तरह इतना फासला तै करके यहाँ तक पहुंचा तो दिया । जहाँ इनके काम मूढ़ता से भरे हुए ज्ञात होते हैं, वहाँ इनकी मूर्खता की अमोलता भी साथ ही साथ भासित हो जाती है। जहाँ ये कुछ कुटिलतापूर्ण दिखाई देते हैं वहाँ इनकी कुटिलता का प्राकृतिक गुण भी नजर आ जाता है। कई एक चीजें, जो भारतवर्ष के रस्मोरवाज के सैंडहरों हैं, अत्यन्त गभीर विचार के साथ देखने योग्य हैं। इस अजायबघर में से नये नये जीते जागते अादर्श सही सलामत निकल सकते हैं। मुझे ये बँडरात खूब भाते हैं । जब कभी अवकाश मिलता है मैं वहीं जाकर सोता हूँ। इन पत्थरो पर खुदी हुई मूर्तियों के दर्शन की अभिलाषा मुझे वहाँ ले जाती है। मुझे उन परम पराक्रमी प्राचीन ऋषियों को आवाजें इन बँडरात में से सुनाई देती हैं। ये सँदेसा पहुंचाने वाले दूर से आये हैं । प्रमुदित होकर कभी मैं इन पत्थरों को इधर टटोलता हूँ, कभी उधर रोलता हूँ। कभी हनुमान् की तरह इनको फोड़ फोड़ कर इनमें अपने राम ही को देखता हूँ। मुझे उन आवाजो के कारण सब कोई मीठे लगते हैं। मेरे तो यही शालग्राम हैं। मैं इनको स्नान कराता हूँ, इन पर फूल चढ़ाता हूँ और घण्टी में पड़ी ८०४