पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/९०

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पवित्रता गया । उसकी सितार की तारें टूट गई । नारद की बीणा चुप हो गई । कृष्ण की बाँसुरी थम गई । ध्रुव का शंख गिर पड़ा । शिव का डमरू बन्द हो गया !! महात्मा पण्डित जी जा रहे हैं, छकड़ा पुस्तकों से लदा साथ जा रहा है। परन्तु पण्डितजी ये अमूल्य पुस्तकें छकड़े समेत अपने सिर पर उठाई हुई हैं। वह क्या हुआ क्या नजर अाया ? अमूल्य पुस्तकें-वेद, दर्शन इत्यादि, पंडितजी के सिर से गिर पड़ीं ? छकड़ा लड़ खड़ाता गङ्गा में बह गया ? सब कुछ जल में प्रवाह कर दिया । पंडितजी का साधारण शरीर, वायु में मानों घुल गया । नाचने लग गए । चाँद के साथ, सूर्य के साथ हाथ पकड़े । नृत्य करते हुए वायु समान समुद्र की लहरों में ब्रह्मकान्ति के साथ जा मिले । हल चलाता चलाता किसान रह गया । बकरी भैंस चराता २ वह और कोई भी उसी तरह लीन हुआ। जूते गाँठता २ एक और कोई दे मरा । भोग विलास की चीजें पास पड़ी हैं। ऊँचे महलों से निकल, सुनहरी पलङ्गों से गिर वह रेत में कौन लोट गया ! सिर से ताज उतार नंगे सिर नंगे पाँव यह अलख कौन जगाता फिरता है ? मोर मुकुट उतार यह सिर पर काँटे धरे शूली की नंगी धार पर वह मीठी नींद कौन सा राम लाड़ला सोता है ? तारों की तरह कभी मैं टूटा और कभी तू टूटा ! कभी इसकी बारी और कभी उसकी बारी आई । मीराँबाई ब्रह्मकान्ति का अमूल्य चिह्न हो गई । गार्गी ने ब्रह्मकान्ति की लाट को अपनी आँख में धारण किया । वेद ने ब्रह्मकान्ति के दर्शनरूप को अपनी आँख लिया । हाय ! ब्रह्मकान्ति के अनन्त प्रकाश में भी मेरे लिए अँधेरा हुया ?! अत्यन्त अत्याचार है–गङ्गाजल तौ हो शीतल, परन्तु मेरा मन अपवित्रता के भावों से भरा हुअा मार्गशीर्ष और पौष की ठंढी रातों में भी अपने काले काले संकल्प के नागों से डसा हुअा जल रहा हो, तड़प रहा हो ?? अपवित्रता का पर्दा जब आँख पर आ जावे तो भला १०