पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/९६

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

पवित्रता पाठक ! क्यों नहीं प्रातःकाल इन कमलों को देखते ? पुस्तकों में और मेरे लेखों में क्या धरा है ! (७) वाह रे चित्रकार ! शाबाश है तेरी अद्भुत कला को, जिसने इस चित्र में पता नहीं किस तरह बिराट स्वरूप भगवान् को प्रानकर लटकादिया ! सारे का सारा विराट्स्वरूप जगत् दर्शाया है। और यह भी किसी की आँख में, परन्तु किस कला से दर्शाया है, न तो श्रांख नज़र आती है, और न अांखवाले के कहीं दर्शन होते हैं, केवल बिराट् स्वरूप ही देख पड़ता है। मुझे कृष्णजी महाराज का खयाल आया, उनके मुख को देखा, पर उनका चित्र ऐसी कला संयुक्त नहीं। क्योंकि साथ ही साथ देखनेवाला भी नज़र आ रहा है। इस अद्भुत चित्र के अन्दर ही अन्दर २ गुप्त प्रकार से लिखा है "पवित्रता” इस शब्द को हूँ दना है। जब तक यह न हूँढ लू, इस चित्र को कैसे छोड़ सकता हूँ । यक्ष पास खड़ा है। चित्रकार ने अपने इस चित्र के दर्शन का यह मूल्य रखा है अगर आगे बढ़ता हूँ तौ सास घुटी जाती है। ऐसा न हो कि युधिष्ठिर राजोधिराज के भाइयों की तरह इस चित्र देखने का मूल्य मृत्यु ही हो ! मुझे अवश्य इस गुप्त शब्द को ढूंढ़ना है, न दृढं तौ मृत्यु हो जायगी, दुःख होगा | मला ऐसे चित्र को देखना और उसके दर्शन की शर्त को न बजा लाना ऐसा ही पाप है कि मृत्यु हो जाय ! ऊपर के आए हुए चित्र तौ साधारण तौर पर कुछ कठिन भी हो । और यदि पवित्रता का स्वरूप भी भान हो तौ नीचे और चित्रों के दर्शन से मैंने के एक को पवित्रता का अनुभव होते वास्तव में देखा है। (८) एक टूटा फूटा कच्ची ईंटों का मकान है। दीवारें इसकी मिट्टी से लिपी हुई हैं। इसकी छत्त घास के तिनकों से बनी है । किसी पक्षी का घोंसला नहीं । यह अच्छा बड़ा है। दरवाजा इसका बहुत ६६