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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१८१

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साहित्यालोचन १६० है। आजकल को आख्यायिकाएँ भी एक प्रकार से उन्हीं कहा- नियों का संशोधित और परिमार्शित रूप हैं। आजकल भी मासिक पत्रों आदि में अनेक ऐसी कहानियाँ निकला करती हैं. जो पुराने ढंग की कहानियों और आधुनिक उंग की आख्यायिकाओं के बीच की होती है। आख्यायिकाओं के प्रचार के साथ ही साथ लोग यह समझने लगे हैं कि आण्या- यिका दिखना भी एक कला है और उसके लिये भी किसी विशेष कौशल की आनश्यकता है। जिस प्रकार उपन्यासों और आख्यायिकाओं के विस्तार में अंतर है, उसी प्रकार उनके उद्देश्य और वस्नु-बिन्यास आदि में भी अंतर है। आख्यायिका का विषय ऐसा होना चाहिए जिसका उसकी संकुचित सीमा के अंदर भली भाँति विकास और निर्वाह हो सके।स विदय में पाठका की रचि का सबसे आयापिका- रचना के सिद्धांत अधिक ध्यान रायना चाहिए । काई आध्यायिका समाप्त करने के उपरांत गहनयाल की यह सम्मति होनी चाहिए कि यदि इस आरयायिका का ओर अधिक विस्तार किया जाता तो उससे कोई लाभ न होता । तात्पर्य यह कि किसी आख्यायिका से पाठकों के मन में यह भात्र उपम हो जाना साहिए कि जो कुछ कहा गया है, यह टोक और पर्याप्त है। इसमें अनावश्यक बातें नहीं आने गाई है और इतने सही भाख्यायिका का जश्व सिद्ध हो गया है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं है कि आपयायिका में किसी एक ही अश्यया क्षणिक पटना