साहित्यासीयन २६८ हो । और तब नाटक का उतारया निगति आरम्भ होनी चाहिए, जिसे संस्कृत नाटककार कार्य कहते हैं। फलागम या परिणाम की सिद्धि मे जो कुल बठिनाइयाँ हो, यहीं से दूर होनी चाहिएँ और तब फलामम या अन्त होना चाहिए। नाटक का अग्न ऐसा न होना चाहिए जिसमें दर्शकों के मन में फिर भी किसी प्रकार की जिज्ञासा बनी रहे और उसका वास्तव में कोई परिणाम निकसना चाहिए । हम पहले कह चुके है कि आधुनिक नाटकों का आधार प्रायः किसी न किसी प्रकार का विरोध हुआ करता है। यह घिरोध बहुधा हो व्यक्तियों, दलों, पक्षी या सिता आदि का होता है। इस विरोध का प्रदर्शन अनेक प्रकारी में और अनेक रूपों में हो सकता है। नाटकों में सदा सद् और असद का ही विरोध दिखलाया जाता है. शिसके कारण असद के प्रति दर्शकों में अरुचि और सडू के प्रति सहानुभूनि उत्पन्न होसी है, और इसी के द्वारा नर्शका को अनेक प्रकार की नैनिक शिक्षाएँ मिलती है। अतः यह विधि से ढंग से दिन म्हाना चाहिए जिसमें सद् के प्रति दर्शकों को श्रद्धा घढ़े और उनक मन पर बहुन अन्छा प्रभाव पड़े, क्योंकि इसो से नाटक का मैतिक महत्व सिम होता है। दर्शको की उत्सुकता बढ़ाने और अन्त में उनको पकित करने के लिये नाटककार कभी कमी अपने नाटक में किसी गुप्त भेद या रहस्य को भी स्थान देते हैं। वे पात्रों, घटनाओं
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