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साहित्य का उद्देश्य

और उनके हृदय की सरसता उन साधारण दृश्यों में कुछ ऐसी सजीवता, कुछ ऐसा रस भर देती है कि पाठक पढ़ने के वक्त ऑखे बन्द करके उसका आनन्द उठाता है, और उसका मन कहता है कि इन दस मिनिटो का इससे अच्छा इस्तेमाल वह न कर सकता था। भारतीय महोदय विद्वान् हैं, हिन्दी के एम० ए० । पुराने कवियो को उन्होने खूब पढ़ा है । और उनकी रचनात्रो की टीकाएँ भी लिखी हैं। मौलिक सृष्टि की ओर उनका ध्यान हाल मे पाया है, और हमारे खयाल मे यह अच्छा ही हुआ । कच्ची लेखनी इस क्षेत्र मे जो ठोकरे खाया करती है, वह उन्हें नहीं खानी पड़ी।

भारतीयजी की कहानियो को अगर किसी पुराने स्कूल की कुल- बधू की उपमा दें, जिसकी जीवन धारा सेवा और त्याग के बीच मे शाति के साथ बहती है, तो श्री वीरेश्वरसिंह की कहानियों मे नये स्कूल की युवती का लोच और सिंगार है, जिसके लिए ससार केवल मर्यादाओं का क्षेत्र नहीं, अानन्द और विनोद का क्षेत्र भी है। इनकी कहानियों मे कुछ ऐसी शोखी, कुछ ऐसी सजावट, कुछ ऐसा बाकपन होता है कि युवक फड़क जाते हैं, और युवतियाँ अॉखें मुका लेती हैं । मगर, इनका दायरा अभी फैलने नहीं पाया है । हमने इनकी जितनी कहानियाँ पढ़ी हैं, अतीत जीवन के दो एक रसीले अनुभवो की झलक मिली है, मगर उनमे यह कुछ ऐसा जादू-सा भर देते हैं कि एक-एक वाक्य को बार- बार पढ़ने को जी चाहता है । बात मे बात पैदा करने मे इन्हे कमाल है और मामूली-सी बात को यह ऐसे सुन्दर, चुलबुले शब्दो मे कह जाते हैं कि सामने फूल-सा खिल जाता है । जैसे-जैसे अनुभवो की सीमा फैलेगी, इनकी रचनाओं मे प्रौढ़ता और गहराई अायगी, मगर हमे आशा है, इनका चुलबुलापन बना रहेगा और इस अनोखे रङ्ग की रक्षा करता रहेगा।

'उसी उपमा की रक्षा करते हुए, हम श्री भुवनेश्वर प्रसाद 'भुवन' की रचनाओं में उस विधवा का तेज और कसक और विद्रोह पाते है,