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साहित्य का उद्देश्य

दर जहाँ बालो - परे खेश कुशूदन आमोज,

कि परीदन् नतवॉ बा परो बाले दिगरॉ।३

जब हिन्दुस्तानी कौमी जबान है, क्योकि किसी न किसी रूप मे यई पन्द्रह-सोलह करोड आदमियो की भाषा है, तो यह भी जरूरी है कि हिन्दुस्तानी जबान मे ही हमे भारतीय साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ पढने को मिले । आप जानते है, हिन्दुस्तान मे बारह उन्नत भाषाएँ हैं और उनके साहित्य हैं । उन साहित्यो मे जो कुछ संग्रह करने लायक है, वह हमे हिन्दुस्तानी जबान मे ही मिलना चाहिये । किसी भाषा मे भी जो-जो अमर साहित्य है, वह सम्पूर्ण राष्ट्र की सम्पत्ति है। मगर अभी तक उन साहित्यो के द्वार हमारे लिए बन्द थे, क्योकि हिन्दुस्तान की बारहो भाषाओ का ज्ञान बिरले को ही होगा । राष्ट्र प्राणियो के उस समूह को कहते है कि जिनकी एक विद्या, एक तहजीब हो, एक राजनैतिक सगठन हो, एक भाषा हो और एक साहित्य हो । हम और आप दिल से चाहते है कि हिन्दु- स्तान सच्चे मानी मे एक कौम बने । इसलिए हमारा कर्तव्य है कि भेद पैदा करने वाले कारणों को मिटाये और मेल पैदा करनेवाले कारणो को संगठित करें । कौम की भावना यूरप मे भी दो-ढाई सौ साल से ज्यादा पुरानी नही । हिन्दुस्तान मे तो यह भावना अग्रेजी राज के विस्तार के साथ ही पायी है । इस गुलामी का एक रोशन पहलू यही है कि उसने हम मे कौमियत की भावना को जन्म दिया। इस खुदादाद मौके से फायदा उठाकर हमे कौमियत के अटूट रिश्ते मे बँध जाना है । भाषा और साहित्य का भेद ही खास तौर से हमे भिन्न भिन्न प्रातीय जत्थो मे बॉटे हुए हैं। अगर हम इस अलग करने वाली बाधा को तोड़ दें तो राष्ट्रीय सस्कृति की एक धारा बहने लगेगी जो कौमियत की सबसे मज-


३) दुनिया मे अपने डैने-पखे को फैलाना सीखो । क्योंकि दूसरे के डैने-पखे के सहारे उड़ना सम्भव नहीं है।