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साहित्य का उदेश्य


बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा-उसके चरित्र अपनी कमजोरियॉ या खूबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन-लीला समाप्त करते हैं। संसार मे सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नही होता, बल्कि इसके विपरीत हुश्रा करता है, नेक आदमी धक्के खाते है, यातनाएं सहते है, मुसीबते झेलते है, अपमानित होते है, उनको नेकी का फल उलटा मिलता है, और बुरे आदमी चैन करते है, नामवर होते है, यशस्वी बनते है, उनको बदी का फल उलटा मिलता है । (प्रकृति का नियम विचित्र है !) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियो मे जकड़ा होता है और कि ससार मे बुरे चरित्रों की ही प्रधानता है-यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र मे भी कुछ न कुछ दाग-धब्बे रहते हैं, इस- लिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी करताश्रो का नाम चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशा- वादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारो तरफ बुराई ही बुराई नजर आने लगती है ।

इसमे सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिए यथार्थवाद अत्यन्त उपयुक्त है, क्योकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने मे अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कही काला दिखायें जितना वह वास्तव मे है । लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने मे शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है। फिर मानव स्वभाव की विशेषता यह भी है कि वह जिस छल, क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नही कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे ससार मे उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले-वह भूल जाय कि मै चिन्ताओ के बन्धन मे पड़ा हुआ हूँ, जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हो; जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल मे ख्याल होता है कि जब हमे