पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१९०

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१० : रस-निष्पत्ति नाट्यशास्त्र के रचयिता ख्यातिनामा भरतमुनि रस-सिद्धान्त' के मूल प्रवर्तक माने गये हैं । उनका ग्रन्थ अपने क्षेत्र में अद्वितीय है किन्तु उन्होंने रस के सम्बन्ध में जो बतलाया है वह ऐसा सूत्र की व्याख्या गोल-मटोल है कि उसके वास्तविक आकार के सम्बन्ध ___में मनचाही कल्पना की जा सकती है । भरतमुनि का मूल सूत्र इस प्रकार है :- . . 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगादसनिष्पत्तिः' -नाट्यशास्त्र (पृष्ठ ७१) अर्थात् विभाव ( नायक-नायिका श्रादि पालम्बन और वीणा-वाद्य, • चन्द्रज्योत्स्ना, मलय-समीर आदि उद्दीपन ), अनुभाव ( अश्रु, स्वेद, कम्पादि भावसूचक शारीरिक विकार और चेष्टाएँ),व्यभिचारी भाव (हर्ष, मद, उत्कण्ठा, असूया; रति, शोक, उत्साह आदि स्थायी भावों के सहचारी भाव) के संयोग से रस की प्राप्ति होती है। इसमें संयोग और निष्पत्ति शब्द विवाद के विशेष विषय रहे हैं । यह सूत्र प्राचार्यों के मस्तिष्क के लिए व्यायामशाला बन गया है। इसकी व्याख्या करने वालों में चार प्राचार्य मुख्य हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-(१) भट्टलोल्लट, (२) श्रीशङ्कक, (३) भट्टनायक, (४) अभिनवगुप्ताचार्य । इनके मतों का पृथक्-पृथक् संक्षेप में विवेचन किया जायगा। १. भट्टलोल्लट का उत्पत्तिवाद:-इस सूत्र के प्रथम व्याख्याता है भट्टलोल्लट' । ये मीमांसा-सिद्धान्त के मानने वाले थे। उनका मत है कि रसादि स्थायी भाव नायिकादि विभावों द्वारा उत्पन्न होकर तथा उद्यान, चन्द्र- ज्योत्स्नादि उद्दीपनों द्वारा उद्दीप्त होकर (जैसे जलाई हुई आग धी से और तेज हो जाती है) एंध कटाक्ष, भुनक्षेप, अश्रु, रोमाञ्चोदि 'अनुभावों अर्थात् वाह्य व्यञ्जकों द्वारा प्रतीतियोग्य अर्थात् जानने योग्य बनकर व्यक्त होकर) और उत्कण्ठादि व्यभिचारियों द्वारा पुष्ट होकर दुष्यन्त रामादि अनुकार्यों में (उन पात्रों में जिनका कि नट अनुकरण करते हैं) रसरूप से रहता है । रूप की समानता के कारण नट में वह रस आरोपित होकर सामाजिकों :( दर्शकों.).. को उनके (नटों के) अभिनय-कौशल द्वारा चमत्कृतः कर देता है, अर्थात् उनको प्रसन्न कर देता है :-