पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२०१

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रस-निष्पत्ति-मतों की तुलना और देन ___चारों प्राचार्यों के मत का संक्षेप पिछले पृष्ठ पर दी हुई सारिणी में देखिए। भट्टलोल्लट और श्रीशंकुक दोनों ही अनुकार्यों को महत्व देते हैं। ये लोग रस .. की लौकिक विषयगत स्थिति को प्रकाश में लाते हैं और मतों की तुलना साधारणीकरण के लिए जो लौकिक प्राधार चाहिए उसकी और देन ओर संकेत करते हैं ( रस की लौकिक स्थिति मानने में . कठिनाइयाँ अवश्य रहती हैं) । काव्यप्रकाश में जो भट्टलोल्लट का मत दिया है उससे यह प्रतीत होता है कि :भट्टलोल्लट नट में रस का आरोप तो करते हैं किन्तु ये सामाजिक को चमत्कृत करने की बात . को स्पष्ट न कर अनुमेय रखते हैं। काव्यप्रकाश के टीकाकारों ने उसे स्पष्ट कर दिया है । श्रीशंकुक के मत में ( वह भी काव्यप्रकाश में वर्णित ) सामाजिक स्पष्ट रूप से प्राजाता है और कुछ अधखुली-सी जबान से उसकी वासना का भी ( जो पीछे से अभिनवगुप्त के मत की आधार-शिला बनती है ) उल्लेख हो जाता है । भट्टलोल्लट के मत के अनुसार नट में दुष्यन्तादि की रति का आरोप किया जाता है और श्रीशंकुक के अनुसार उसमें अनुमान किया जाता है । आरोप निराधार भी हो सकता है किन्तु अनुमान में किञ्चित आधार रहता है। इन दोनों की देन इतनी ही है कि ये लोग कल्पना को नितान्त निराधार होने से बचाये रखते हैं। वे आजकल के उपन्यासों के कल्पित पात्रों की व्याख्या कुछ कठिनाई ही से कर सकते हैं । कल्पना का जो वास्तविक आधार होता है उसकी ओर ये संकेत अवश्य कर देते हैं। यद्यपि साधारणीकरण की मूल भावना की क्षीण झलक नट के अनुकरण म (नट दुष्यन्त का साधारण राजारूप से ही अनुकरण करता है, दुष्यन्त को तो वह जानता नहीं) रहती है तथापि इस सिद्धान्त को पूर्ण विकास देने का श्रेय भट्टनायक को ही है। भोजकत्व में सामाजिक के कर्तव्य की ओर संकेत रहता है और उसके रस के मूल अर्थ आस्वादकत्व की भी सार्थकता हो जाती है किन्तु उन्होंने सामाजिक में ऐसे किसी गुण का संकेत नहीं किया जिसके कारण सामाजिक में भोजकत्व की सम्भावना रहती है। इस कमी को अभि- नवगुप्त ने पूरा किया है। उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सामाजिक अपनी रति का अस्वाद लेता है, विभावादि का वर्णन उसे जाग्रत करता है। रस में व्यजना-व्यापार की प्रधानता बतलाकर अभिनव ने कृति और पाठक दोनों को महत्त्व दिया है। व्यङ्गयार्थ उसके बोधक की अपेक्षा रखता है। . काव्य' का रस न तो नालियों में बहा फिरता है और न ईख के रस की भाँति निष्पीड़ित होता है, जैसा कि कभी-कभी केशवादि के काव्य में दिखाई देता