पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/३५

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( ३१ ) सिद्धान्त हैं और उन सिद्धान्तों को भारतीय साहित्य के अध्ययन से उदाहरण देकर पुष्ट किया गया है। दूसरे भाग में काव्य के विभन्न रूपों का वर्णन है। इसमें उनके सैद्धान्तिक विवेचन के साथ उनका हिन्दी भाषा में विकास भी दिखाया गया है। ये दोनों भाग मिलकर साहित्यालोचन का पूरा क्षेत्र व्याप्त कर लेते हैं। पाठकों की गुणग्राहकता के कारण इस ग्रन्थ का तीसरा संस्करण हो रहा है । इस ग्रन्थ में आवश्यक परिवर्द्धन और संशोधन के साथ एक बात का विशेष रूप से ध्यान दिया गया है कि जितने उद्धरण दिये गये हैं उनका यथा- सम्भव पूरा अता-पता भी दे दिया गया है जिससे कि पाठकगण उद्धरणों और अवतरित प्रसङ्गों के सम्बन्ध म निजी जानकारी प्राप्त करें और उस सम्बन्ध में अपने अध्ययन को अग्नसर कर सके । इस सम्बन्ध में मेरे शिष्य और स्वजन श्रीचिरंजीलाल 'एकाकी' ने जितना परिश्रम किया है वह कथन से बाहर है। इस ग्रन्थ के सुन्दर सम्पादन का पूर्ण श्रेय 'एकाकी' जी को है। यदि मुझे कुछ श्रेय है तो इतना ही कि जहाँ जो बात पूछी उसके बताने में अधिक अनाकानी नहीं की । 'एकाकी' जी को मैं धन्यवाद नहीं देता क्योंकि उनकी श्रद्धा का मूल्य धन्यवाद देकर घटाना होगा । जिन महानुभावों के ग्रन्थों से इस पुस्तक में सहायता ली गई है उनके प्रति में हृदय से प्राभारी हूँ । ऐसी पुस्तकों की सूची मैंने अन्त में दे दी है। पाठकगण विशेष अध्ययन के लिए उनसे लाभ उठा सकते हैं। गोमती-निवास, दिल्ली दरवाजा, श्रागरा। गुलाबराय चैत्र शुक्ला १, २००८