पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/७९

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साहित्य की प्रेरणाएं -जीवन की प्रेरणाएँ विचार उपनिषद्-काल से चला आ रहा है । वृहदारण्यक उपनिषद् में पुत्रषणा, वित्तषणा और लोकैषणा अर्थात् पुत्र की चाह, धन को जीवन की चाह और लोक अर्थात् यश की चाह मानी है । ये साधारण प्रेरणाएँ मनुष्य की चाहें हैं । ब्राह्मण इनसे ऊँचा उठकर त्याग ___का जीवन व्यतीत करता है, आत्मा को जानकर इनकी चाह नहीं रहती है :- "एवं वै तदात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तषणायाश्च लोकैष- णायाश्च व्युत्थायाय भिक्षाचर्य चरन्ति ।' -वृहदारण्यक (३।११) ___ योरुप के मनोविश्लेषण-शास्त्र ( Psychanalysis ) का भी उदय इन्हीं प्रेरणात्रों के अध्ययन के लिए हुआ । इस शास्त्र के तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं । उनके प्राचार्यों के नाम हैं--फ्रायड ( Freud ), एडलर (Aaler) और युग (Jung)। फ्रायड : फायड ने प्रायः सभी क्रियाओं का मूल कामवासना में माना है । ये वासनाएँ अपने विकसित रूप में ही नहीं वरन् बाल्यकाल के अविकसित रूप में भी जीवन की क्रियाओं की मूल प्रेरक शक्ति रहती हैं । ये सामाजिक शिष्टाचार और रोक-थाम के कारण, जिसको फ्रायड ने अंग्रेजी में सेन्सर (Censor ) कहा है और हिन्दी में हम औचित्यदर्शक कह सकते हैं, उपचेतना में दब जाती हैं। वहाँ से वे हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं और अपने निकास का मार्ग खोजती रहती हैं किन्तु बदले हुए रूप में, जिससे कि वे सेन्सर की निगाह और रोक-थाम से बची रहें। इन निकास के मार्गों में मुख्य हैं-स्वप्न, दैनिक भूलें और हँसी-मजाक । कला और काव्य भी इन्हीं निकास के मार्गों में से हैं किन्तु ये अधिक परिष्कृत और परिमार्जित हैं । साहित्य और कविता में वासना का उन्नयन या पर्युत्थान (Sublimation ) हो जाता है । जैसे निराश प्रेम का देश-प्रेम में पर्युत्थान हो जाता है वैसे ही ईश्वर-प्रेम या प्रकृति-प्रेम के रूप में वह साहित्य में आजाता है। फायड से प्रभावित लोग ऐसा ही मानते हैं । एडलर : एडलर महोदय किसी अभाव या क्षति की पूर्ति को जीवन की मूल प्रेरक शक्ति मानते हैं। बच्चा छुटपन से ही किसी शारीरिक या परिस्थिति-सम्बन्धी कमी का अनुभव करता है । उसके मन में हीनता-भाव की एक गुत्थी जिसको अंग्रेजी में 'Inferiority Complex, कहते हैं, बन जाती है। उसी से प्रेरित हो वह अपनी कमी को पूर्ण करने के लिए भले या बुरे उपाय काम में लाया