पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/२४

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सुखशवरा । . Re - - onlunnnnn. + 1 + 1 + 1 + 1 + V s v • न जाने इस समय कैसा मन होगया है ! हा!!!" .... चिन्ता से भरी बालिका सीढ़ी उतर कर नीचे की सीढ़ी पर आगई । गङ्गा की कैसी शोभा है ? पूर्णिमा के पूर्णचन्द्र की प्रभा से प्रतिभात होकर जान्हवी का पवित्र जल चमचम करता था: मानो हँस रहा हो! बड़ा आल्हाद !! जलकण लिये शीतल समीर सनसना रही थी, और रह रह कर जल की तरङ्गों में आघात करती थी। . अनाथिनी ने बहुत देर तक चिन्ता करके आप ही आप कहा,-"गंगा मैया! अभागी लड़की का निवेदन सुनोगी ?" सरसर शब्द से घायु ने मानो पूछा, 'क्या?" जैसे प्रार्थनाकांक्षिणी कन्या प्यारी माता के पास किसी चीज को मांगती है, वा कोई गुप्त रहस्य प्रकाश करती है, उसी तरह अनाथिनी ने गङ्गाजी की ओर सिर झुका कर बड़ी करुणा से कहा,-"मां! या करके अभागिनी बेटी को क्या अपनी गोदी में लोगी ?" . उस समय जोर से हवा चली, गंगा में एक पर दूसरी तरङ्ग टक्कर मारने लगी, मानो भागीरथी अनाथिनी की बात सुनकर रुष्ट हुई। बालिका अपनी प्रार्थना सुनाकर न जाने क्या सोचने लगी, फिर बोली,-"मां! यदि मेरा हृदय कोमल न होता तो बलपूर्वक तुम्हारी गोदी में सोती। क्यों विधाता ने सरल हदय बनाया ? कर्म में इतना दुःख लिखा, तो हदय पत्थर सा क्यों नहीं बनाया ? नहीं तो आज तुम्हारे उदर में प्रवेश करके सब दुःख को एक दम भूल जाती और शान्ति पाती। आन पड़ता है कि पहिले जन्म में मैने बड़ा पाप किया था, उसीके फल भोगने के लिये बिधाता ने मेरे भाग्य में इतना दुःख लिखा है, अर्थात् मेरा हदय कोमल बनाया है। मां ! सुना है कि तुमने सैकड़ों मनुष्यों का उद्धार किया है, तब निःसहाय अबला कन्या पर क्यों नहीं दया होती ? मां! जब मैं सो जाऊं तो मुझे वायु के सहारे से अपनी गोद में ले लेना।" बालिका ने रोते रोते चन्द्रमा की ओर देखकर कहा,"निशाकर ! क्या तुम भी अभागिनी पर दया न करोगे ? प्रिय ! तुम जल्दी अस्त मत होना, नहीं तो सूर्योदय होने पर मैं फिसके द्वार पर खड़ी होऊंगी ?"