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सेवासदन
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मैंने कहा, मुझे कोई उल्लू समझा है क्या? पीछा छोड़ाकर भागा, इसी में देरी हो गई।

सुमन-कई दिन हुए मैंने आपसे कहा था कि किवाडोंं में वार्निश लगवा दीजिये। आपने कहा, वार्निश कहीं मिलती ही नहीं। यह देखिये, आज मैंने एक बोतल वार्निश मँगा रखी है। कल जरूर लगवा दीजिये। पंडित दीनानाथ मसनद लगाये बैठे थे। उनके सिर ही पर वह ताक था, जिसपर वार्निश रक्खी हुई थी,। सुमन ने बोतल उठाई, लेकिन मालूम नहीं कैसे बोतल की पेंदी अलग हो गई और पंडितजी वार्निश से नहा उठे। ऐसा मालूम होता था, मानो शीरे की नाद में फिसल पड़े हो। वह चौककर उठ खड़े हुए और साफा उतारकर रूमाल से पोंछने लगे।

सुमन ने कहा-मालूम नहीं बोतल टूटी थी क्या सारी वार्निश खराब हो गई।

दीनानाथ--तुम्हे अपनी वार्निश की पड़ी है, यहाँ सारे कपड़े तर हो गये। अब घरतक पहुँचना मुश्किल है।

सुमन-रात को कौन देखता है, चुपके से निकल जाइयेगा।

दीना-अजी, रहने भी दो, सारे कपड़े सत्यानाश कर दिये, अब उपाय बता रही हो। अब यह धूल भी नही सकते।

सुमन-तो क्या मैने जान बूझकर गिरा दिया?

दीना-तुम्हारे मन का हाल कौन जाने?

सुमन-अच्छा जाइये, जानकर ही गिरा दिया।

दीना-अरे तो मैं कुछ कहता हूँ, जी चाहे और गिरा दो।

सुमन-बहुत होगा अपने कपड़ों की कीमत ले लीजियेगा।

दीना-क्यों खफा होती हो सरकार? मैं तो कह रहा हूँ, गिरा दिया अच्छा किया।

सुमन-इस तरह कह रहे है, मानो मेरे साथ बड़ी रियायत कर रहें हैं।

दीना--सुमन, क्यों लज्जित करती हो?