पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१३१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
१४४
सेवासदन
 

से जो प्रेम था, उसमें तृष्णा हीन का आधिक्य था। सुमन उसके हृदय में रहकर भी उसके जीवन का आधार न बन सकती थी सदनके पास यदि कुबेर का घन होता तो वह सुमन को अर्पण कर देता। वह अपने जीवनके सम्पूर्णसुख,उसकी भेंट कर सकता था,किन्तु अपने दुखसे विपत्ति से कठिनाइयों से नैराश्य से वह उसे दूर रखता था। उसके साथ वह सुख का आनंद उठा सकता था लेकिन दुःख आनन्द नहीं उठा सकता था। सुमन पर उसे वह विश्वास कहाँ था जो प्रेम का प्राण है! अब वह कपट प्रेम के मायाजाल से मुक्त हो जायगा। अब उसे बहुरूप धरने की आवश्यकता नहीं। अब वह प्रेम को यथार्थ रूप में देवेगा यथार्थ रूप दिखावेगा । यहाँ उसे वह अमूल्य वस्तु मिलेगी जो सुमन के यहां किसी प्रकार नहीं मिल सकती थी। इन विचारों ने सदन को इस नये प्रेम के लिए लालायित कर दिया। अब उसे केवल यही संशय था कि कही वधू रूपवती न हुई तो? रूप लावण्य प्राकृतिक गुण है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। स्वभाव एक उपार्जित गुण है, उसमें शिक्षा और सत्संग से सुधार हो सकता है।सदन ने इस विषय में समुराल केनाई से पूछ ताछ करने की ठानी; उसे खूब भंग पिलाई खूब मिठाइयां खिलाई। अपनी एक धोती उसको भेट की।नाईने नशे में आकर बखूकी ऐसी लम्बी प्रशंसा की, उसके नखशिख का ऐसा चित्र खीचा कि सदन को इस विषयों को सन्देह न रहा यह नखशिख सुमनसे बहुत कुछ मिलता था। अतएव सदन नवेली दुलहिन का स्वागत करने के लिए और भी उत्सुक हो गया।

२३

यह बात बिल्कुल तो सत्य नहीं है कि ईश्वर सबको किसी न किसी हीले से अन्न वस्त्र देता है। पण्डित उमानाथ बिना किसी हीलेही संसार का सुख भोग करते थे। उनकी आकाशी वृत्ति थी। उनके भैंस और गायें न थी,लेकिन घर में घी-दूध की नदी बहती थी, यह खेती बारी न करते थे, लेकिन घरमें अनाज की सत्तियाँ भरी रहती थी। गाँवमें कहीं मछली मरे, कही