पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१३६

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सेवासदन
१४९,
 

को उनका कठोर नाद अप्रिय लगता था। विट्ठलदासको इसकी चिन्ता न थी।

पद्मसिंह धनी मनुष्य थे। उन्होंने बड़े उत्साहसे वेश्याओंको शहर मुख्य स्थानोसे निकालनेके लिए आन्दोलन करना शुरू किया। म्युनिसि पैलिटीके अधिकारियोंमें दो चार सज्जन बिट्ठलदास भक्त भी थे। किन्तु वे इस प्रस्तावको कार्य रूपमें लाने के लिए यथेष्ट साहस न रखते थे। समस्या इतनी जटिल थी कि उसकी कल्पना ही लोगों को भयभीत कर देती थी।वे सोचते थे कि इस प्रस्तावको उठाने से न मालूम शहरमे क्या हलचल मचे शहरके कितने ही रईस, कितने ही राज्यपदाधिकारी,कितने ही सौदागर इस प्रेममण्डीसे सम्बन्ध रखते थे। कोई ग्राहक था, कोई पारखी, उन सबसे बैर मोल लेनेका कौन साहस करता? म्युनिसिपैलिटीके अधिकारी उनके हाथोंमे कठपुतलीके समान थे।


पद्मसिंहने मेम्बरोसे मिलमिलाकर उनका ध्यान इस प्रस्तावकी ओर आकर्षित किया| प्रभाकररावकी तीव्र लेखनीने उनकी बडी सहायता की।पैम्फलेट निकाले गये और जनताको जागृत करनेके लिए व्याख्यानोका कम वॉधागया। रमेशदत्त और पद्मसिंह इस विषयमें निपुण थे। इसका भार उन्होंने अपने सिर ले लिया।अब आन्दोलनने एक नियमित रूप धारण किया।

पद्मसिंहने यह प्रस्ताव उठा तो दिया, लेकिन वह इसपर जितना ही विचार करते थे,उतने ही अन्धकारमे पड़ जाते थे। उन्हे यह विश्वास न होता था कि वेश्कयाओ निवसनसे आशातीत उपकार हो सकेगा। संभव है, उपकारके बदले अपकार हो। बुराइयोका मुख्य उपचार मनुष्यका सट्ठन है। इसके बिना कोई उपाय सफल नही हो सकता ।कभी-कभी वह सोचते- सोचते हताश हो जाते। लेकिन इस पक्षके एक सभ्य बनकर वे आप सन्देह रखते हुए भी दूसरो पर इसे प्रकट न करते थे। जनताके सामने तो उन्हे सुधारक बनते हुए सकोच न होता था, लेकिन अपने मित्रो और सज्ज नोके सामने वह दृह न रह सकते। उनके सामने आना शर्माजीके लिए