पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१३७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
१५०
सेवासदन
 


वही कठिन परीक्षा थी। कोई कहता, किस फेर में पड़े हो, विट्ठलदास के चक्कर में तुम भी आ गये? चैन से जीवन व्यतीत करो। इन सब झमेलो में क्यों व्यर्थ पड़ते हो? कोई कहता, यार मालूम होता है, तुम्हें किसी औरत ने चरका दिया है, तभी तुम वेश्याओं पीछे इस तरह पड़े हो? ऐसे मित्रों के सामने आदर्श और उपकारकी बातचीत करना अपनको बेवकूफ बनाना था।

व्याख्यान देते हुए भी जब शर्मा जी कोई भावपूर्ण बात कहते करुणात्मक दृथ्य दिखाने की चेष्टा करते तो उन्हें शब्द नही मिलते थे, और शब्द मिलते तो उन्हें निकालते हुए शर्माजी को बड़ी लज्जा आती थी। यथार्य में बह इस रस में पगे नहीं थे। वह जब अपने भावशैथिल्यकी विवेचना करते तो उन्हें ज्ञात होता था कि मेरा हृदय प्रेम और अनुराग से खाली है।

कोई व्याख्यान समाप्त कर चुकने पर शर्माजी को यह जानने की उतनी इच्छा नही होती थी कि श्रोताओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ा, जितनी इसकी कि व्याख्यान सुन्दर, सप्रमाण और ओजपूर्ण था या नहीं।

लेकिन इन समस्याओं के होते हुए भी यह आन्दोलन दिनों-दिन बढ़ता जाता था। यह सफलता शमजी कें अनुराग और विश्वास में कुछ कम उत्साहवर्धक न थी।

सदनसिंह के विवाह को अभी दो मास थे। घर की चिन्ताओं से मुक्त होकर शर्माजी अपनी पूरी शक्ति से इस आन्दोलन में प्रवृत्त हो गये। कचहरी के काम में उनका जी न लगता। वह भी वे प्रायः इन्हीं चर्चाओं में पड़े रहते। एक ही विषय पर लगातार सोचते विचारते रहने से उस विषय से प्रेम हो जाया करता है। धीरे-धीरे शर्माजी के हृदय में प्रेमका उदय होने लगा।

लेकिन जब यह विवाह निकट आ गया तो शर्माजी का उत्साह कुछ क्षीण होने लगा। मन में यह समस्या उठी कि भैया यहाँ वेश्याओं के लिये अवश्य ही मुझे लिखेंगे उस समय में क्या कहूँगा? नाच बिना सभा सूनी रहेगी, दूर दूर: गाँवो से लोग नाच देखने आवेंगे नाच न देखकर उन्हें निराशा होगी, भाई साहब बुरा मानेंगे, ऐसी अवस्था में मेरा क्या कर्तव्य है? भाई साहब को इस कुप्रयासे रोकना चाहिए। लेकिन क्या में