पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१३९

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सेवासदन
 

मदन-अच्छा,यह बात है। भला किसी तरह लोगों की आखें तो खुली। मैं भी इस प्रयाको निन्द्य समझता हूँ, लेकिन नक्कू नहीं बनना चाहता। जब सब लोग छोड़ देगें तो मैं भी छोड़ दूँगा, मुझको ऐसी क्या पड़ी है कि सबके आगे चलूं। मेरे एक ही लड़का है, उसके विवाह में मन के सब हौसले पूरे करना चाहता हूँ। विवाह बाद में भी तुम्हारा मत स्वीकार कर लूँगा। इस समय मुझे अपने पुराने ढंगपर चलने दो, और यदि बहुत कष्ट न हो तो सवेरे की गाड़ी से चले जाओ और बीड़ा देकर उधर से ही अमोला चले जाना। तुमसे इसलिए कहता हूँ कि तुम्हें वहाँ लोग जानते हैं। दूसरे जायेंगे तो लुट जायेंगे।

पद्मसिंह ने सिर झुका लिया और सोचने लगे। उन्हें चुप देखकर मदन सिंह ने तेवर बदलकर कहा, चुप क्यों हो, क्या जाना नही चाहते?

पद्मसिंहने अत्यन्त दीन भाव से कहा—भैया, आप यदि मुझे क्षमा करें तो .......

मदन नहीं नहीं, मैं तुम्हें मजबूर नहीं करता, नहीं जाना चाहते तो मत जाओ। मुन्शी बैजनाथ, आपको कष्ट तो होगा, पर मेरी खातिर से आप ही जाइय।

बैजनाथ---मुझे कोई उज्र नही है।

मदन—उधर से ही अमोला चले जाइयेगा। आपका अनुग्रह होगा।

बैजनाथ---आप इतमीनान रखें, मैं चला जाऊंगा।

कुछ देर तीनों आदमी चुप बैठे रहे। मदनसिंह अपने भाई को कृतघ्न समझ रहे थे। बैजनाथ को चिन्ता हो रही थी कि मदनसिंह का पक्ष ग्रहण करने से पद्मसिंह बुरा तो न मान जायेंगे और पद्मसिंह अपने बड़े भाई की अप्रसन्नता भय से दबे हुए थे। सिर उठाने का साहस नहीं होता था। एक ओर भाई की अप्रसन्नता थी दूसरी ओर अपने सिद्धान्त और न्याय का बलिदान। एक ओर अन्धेरी घाटी थी, दूसरी ओर सीधी चट्टान, निकलने का कोई मार्ग न था। अन्त में उन्होने डरते-डरते कहा, भाई साहब, आपने मेरी भूले कितनी ही बार क्षमा की है, मेरी एक ढिठाई और क्षमा कीजिये।