पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१५५

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सेवासदन
 


कृष्ण — इसीलिए कि तुम इज्जतवाले हो और मेरा कोई ठिकाना नहीं। मित्र, क्यों मुंह खुलवाते हो? धर्मका स्वांग भरकर क्यों डींग मारते हो? थानेदारों की दलाली करके भी तुम्हें इज्जत का घमण्ड है?

उमानाथ—में अधम पापी सही,पर आपके साथ मैंने जो सलूक किये उन्हें देखते हुए आपके मुह से ये बातें न निकलनी चाहिए।

कृष्ण—तुमने मेरे साथ वह सलूक किया कि मेरा घर चौपट कर दिया। सलूक का नाम लेते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? तुम्हारे सलूक का बखान यहाँ अच्छी तरह सुन चुका। तुमने मेरी स्त्री को मारा,मेरी एक लड़की को न जाने किस लम्पट के गले वाँध दिया और दूसरी लड़कीसे मजदूरिन की तरह काम ले रहे हो। मूर्ख स्त्री को झांसा देकर मुकदमा लड़ने के बहाने से सब रुपये उड़ा लिये और तब अपने घर लाकर उसकी दुर्गति की। आज अपने सलूक की शेखी बघारते हो।

अभिमानी मनुष्यको कृतघ्नता से जितना दु:ख होता है उतना औीर किसी वात से नहीं होता। वह चाहे अपने उपकारों के लिए कृतज्ञता का भूखा न हो, चाहे उसने नेकी करले दरिया ही में डाल दी हो,पर उपकार का विचार करके उसको अत्यन्त गौरव का आनन्द प्राप्त होता है। उमानाथ ने सोचा, संसार कितना कुटिल ई। मैं इनके लिए महीनों कचहरी दरबार के चक्कर लगाता रहा, वकीलों की कैसी-सी खुशामदें की, कर्मचारियों के कैसे कैसे नखरे सहे,निजका सैकड़ों रुपया फूंक दिया, उसका यह यश मिल रहा है। तीन-तीन प्राणियों का बरसों पालन-पोषण किया, सुमनके विवाहके लिए महीनों खाक छानी और शान्ता के विवाह के लिए महीनों से घर घाट एक किये हैं, दौड़ते-दौड़ते पैरों में छाले पड़ गये,रुपये-पैसेकी चिन्ता मे शरीर घुल गया और इसका यह फल हा! कुटिल संसार में यहाँ भलाई करने में भी धब्बा लग जाता है। यह सोचकर उनकी आंखें डबडबा आई। बोले भाई साहब, मैंने जो कुछ किया, वह भला ही समझकर किया, पर मेरे हाथोमें यश नही है। ईश्वरको यही इच्छा है कि मेरा किया-कराया मारा