पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१६९

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सेवासदन
 


नेत्र ज्योतिहीन हो गये । बोले, महाराज ... .......और उनके मुखसे कुछ न निकला ।

मदनसिंहने गरज कर कहा स्पष्ट क्यों नही बोलते ? यह बात सच है या झूठ ?

उमानाथ ने फिर उत्तर देना चाहा, किन्तु 'महाराज ' के सिवा और कुछ न कह सके ।

मदनसिहको अब कोई सन्देह न रहा। क्रोध की अग्नि प्रचंड हो गई । आँखों से ज्वाला निकलने लगी । शरीर काँपने लगा। उमानाथ की और आग्नेय दृष्टि से ताककर बोले, अब अपना कल्याण चाहते हो तो मेरे सामने से हट जाओ। ,धूर्त्त दगाबाज, पाखण्डी कहीं का । तिलक लगाकर पण्डित बना फिरता है, चांडाल में अब तेरे द्वारपर पानी न पीऊँगा । अपनी लड़कीको यन्तर बनाकर गले मे पहन । यह कहकर मदनसिंह उठे और उस छोलदारी में चले गये जहाँ सदन पड़ा सो रहा था और जोर से चिल्लाकर कहारो को पुकारा !

उनके जानेपर उमानाथ पद्मसिंहसे बोले, महाराज ,किसी प्रकार पण्डितजी को मनाइये । मुझे कही मुँह दिखाने को जगह न रहेगी । सुमन का हाल तो आपने सुना ही होगा । उस अभागिन ने मेरे मुँह में कालिख लगा दी । ईश्वर की यही इच्छा थी, पर अब गड़े हुए मुरदे उखाड़ने से क्या लाभ होगा । आप ही न्याय कीजिये, मैं इस बात को छिपाने के सिवा और क्या करता ? इस कन्या का विवाह करना ही था । वह बात छिपाये बिना कैसे बनता ? आपसे सत्य कहता हूँ कि मुझे यह समाचार सबन्ध ठीक हो जानेके बाद मिला ।

पद्मसिंह ने चिंतित स्वर से कहा, भाई साहब के कान में बात न पड़ी होती तो यह सब कुछ न होता । देखिये मैं उनके पास जाता हूँ पर उनका राजी होना कठिन मालूम होता है । कहारों से चिल्लाकर कह रहे थे कि जल्द यहाँ से चलने की