पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१७०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
सेवासदन
१९१
 


तैयारी करो। सदन भी अपने कपड़े समेट रहा था। उसके पिता ने सब हाल उससे कह दिया था।

इतने में। पद्मसिंह ने आकर आग्रहपूर्वक कहा, भैया, इतनी जल्दी न कीजिये। जरा सोच समझकर काम कीजिए। धोखा तो हो ही गया, पर यों लौट चलने मे तो और भी जग हंसाई है।

सदन ने चाचा की ओर अवहेलनाकी दृष्टिसे देखा, और मदनसिंह ने आशचर्य से।

पद्मसिंह——दो चार आदमियों से पूछ देखिये क्या राय है।

मदन——क्या कहते हो, क्या जानबूझकर जीती मक्खी निगल जाऊँ?

पद्म——इसमें कम से कम जग हँसाई तो न होगी।

मदन——तुम अभी लडके हो, ये बाते क्या जानो? जाओ, लौटने का सामान करो। इस वक्त की जग हँसाई अच्छी है। कुल में सदा के लिये कलंक तो न लगेगा।

पद्म——लेकिन यह तो विचार कीजिये कि कन्या की क्या गति होगी। उसने क्या अपराध किया है?

मदनसिंह ने झिड़ककर कहा, तुम हो निरे मूर्ख। चलकर डेरे लदाओ। कल को कोई बात पड़ जायगी तो तुम्हीं गालियाँ दोगे कि रुपए पर फिसल पड़े। संसार के व्यवहार में वकालत से काम नहीं चलता।

पद्मसिंहने कातर नेत्रो से देखते हुए कहा, मुझे आपकी आज्ञा से इनकार नहीं है, लेकिन शोक है कि इस कन्या का जीवन नष्ट हो जायगा।

मदन—— तुम खामख्वाह क्रोध दिलाते हो। लड़की का मैने ठीक़ा लिया है? जो कुछ उसके भाग्य में बदा होगा, वह होगा। मुझे इससे क्या प्रयोजन?

पद्मसिंह ने नैराग्यपूर्ण भाव से कहा, सुमन का आना जाना बिलकुल बन्द है। इन लोगों ने उसे त्याग दिया है।

मदन, मैंने तुम्हें कह दिया कि मुझे गुस्सा न दिलाबो। तुम्हें ऐसी

१३