पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१८४

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सेवासदन २०९

जैसे अमूल्य ग्रन्थकी रचना हुई, सूरसागर जैसा आनन्दमय काव्य रचा गया, उसी देशमें अब साधारण उपन्यासों के लिए हमको अनुवादका आश्रय लेना पड़ता है।बंगाल और महाराष्ट्र में अभी गानेका कुछ प्रचार है,इसलिए वहाँ भावों का ऐसा शैथिल्य नहीं है। वहाँ रचना और कल्पना-शक्ति का ऐसा अभाव नहीं है। मैने तो हिन्दी साहित्य का पढ़ना ही छोड़ दिया। अनुवादों को निकाल डालिये तो आपके नवीन हिन्दी साहित्य में हरिशचन्द्र के दो चार नाटकों और चन्द्रकान्ता सन्तति‌ के सिवा और कुछ रहता ही नही। संसार का कोई साहित्य इतना दरिद्र न होगा।उसपर तुर्रा यह है कि जिन महानुभावों ने दो-एक अंगरेजी ग्रन्थों के अनुवाद मराठी और बंगला अनवादों की सहायता से कर लिए वे अपनें को धुरन्धर साहित्यज्ञ समझने लगे है। एक महाशय ने कालिदास‌ के कई नाटकों के पद्यबद्ध अनुवाद किये है,लेकिन वे अपने को हिन्दी का कालिदास समझते है'एक महाशय ने मिलके दो गन्थों का अनुवाद किया है और वह भी स्वतन्त्र नही,बल्कि गुजराती,मराठी आदि अनुवादो के सहारे से, पर वह अपने मन मे ऐसे सन्तुष्ट है मानो उन्होंने हिन्दी साहित्य का उद्धार का दिया। मेरा तो यह निश्चय होता जाता है कि अनुवादो‌ं से हिन्दी का अपकार हो रहा है। मौलिकता को पनपने का अवसर नहीं मिलने पाता।

पद्मसिंहको यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कुंवर साहब का साहित्य से इतना परिचय है। वह समझते थे कि इन्हें पोलो और शिकार के सिवाय और किसी चीज से प्रेम न होगा। वह स्वयं हिन्दी-साहित्य से अपरिचित थे,पर कुंवर साहब के सामने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते संकोच होता था। उन्होंने इस तरह मुस्कुराकर देखा मानो यह सब बाते इन्हें पहले ही से मालूम थी और बोले,आपने तो ऐसा प्रश्न उठाया जिसपर दोनों पक्षों की ओर से बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर इस समय मैं आपकी। सेवामे किसी और ही कामसे आया हूँ। मैंने सुना है कि हिन्दू मेम्बरो के जलसे मे आपने सेठों का पक्ष ग्रहण किया।

कुंवर साहब ठठाकर हंसे। उनकी हंसी कमरे में गूंज उठी। पीतलकी