पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१८३

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२०८ सेवासदन


दोपहर हो गया था,लेकिन पद्मसिहको भूख प्यास न थी। बग्घीपर बैठकर चले । कुंवर साहब बरुना-किनारे एक बंगलेमें रहते थे । आधघंटे में जा पहुंचे ।

बंगलेके हातेमें न कोई सजावट थी,न सफाई । फूलपत्ती का नाम न था। बरामदेमें कई कुत्ते जंजीर में बँधे खडे थे । एक तरफ कई घोड़े बंधे हुए थे । कुंवर साहब को शिकार का बहुत शौक था । कभी-कभी काश्मीर तक का चक्कर लगाया करते थे । इस समय वह सामने कमरेमें बैठे हुए सितार बजा रहे थे । दीवारोपर चीतोकी खाले और हिरनोके सीग शोभा दे रहे थे । एक कोनेमें कई बन्दूकें और बरछियाँ रखी हुई थी; दूसरी ओर एक बड़ी मेजपर एक घड़ियाल बैठा था । पद्मसिंह कमरे में आये तो उसे देखकर एक बार चौंक पड़े । खालमें ऐसी सफाईसे भूसा भरा गया था कि उसमें जानसी पड़ गयी थी ।

कुंवर साहब ने शर्माजी का बड़े प्रेमसे स्वागत किया——आइये महाशय,आपके तो दर्शन दुर्लभ हो गये । घरसे कब आए ?

पझसिंह——कल आया हूं ।

कुंवर——चहर उतरा है, बीमार थे क्या ?

पद्म——जी नहीं बहुत अच्छी तरह हूं।

कुंवर——जुछ जलपान कीजियेगा ?

पद्म——नहीं क्षमा कीजिये,क्या सितार का अभ्यास हो रहा है ?

कुंवर——जी हाँ, मुझे तो अपना सितार ही पसन्द है । हारमोनियम और प्यानों सुनकर मुझे मतलीसी होने लगती है, इन अंगरेजी वाजों ने हमारे संगीत को चौपट कर दिया, इसकी चर्चा ही उठ गई। जो कुछ कसर रह गई थी, वह थिएटरों ने पूरी कर दी । बस,जिसे देखिए गजल और कौवाली की रट लगा रहा है । थोड़े दिनो में धनुविद्या की तरह इसका भी लोप हो जायगा। संगीत से हृदयमें पवित्र भाव पैदा होते है । जबसे गाने का प्रचार कम हुआ, हम लोग भावशून्य हो गए और इसका सबसे बुरा असर हमारे साहित्यपर पड़ा हैं । कितने शोक की बात है कि जिस देश में रामायण