पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१८६

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सेवासदन
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किसी बड़े रमणीक स्थानकी सैर कर के आते हो। कुँवर साहब के प्रेम और उन्हें वशीभूत कर लिया था।

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सदन जब घर पर पहुँचा तो उसके मन की दशा उस मनुष्य की-सी थी जो बरसों की कमाई लिए, मन में सहस्रों मन्सूबे बाँधता, हर्ष से उल्लसित घर आये और यहाँ सन्दूक खोलने पर उसे मालूम हो कि थैली खाली पड़ी हैं।

विचारों की स्वतन्त्रता विद्या संगति और अनुभवपर निर्भर होती है। सदन ने सभी गुणों से रहित था। यह उसके जीवन का वह समय था जब उसको अपने धार्मिक विचारों पर, अपनी सामाजिक रीतियों पर एक अभिमान-सा होता है। हमें उनमें कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती, जबहम अपने धर्म के विरुद्ध कोई प्रमाण या दलील सुनने का साहस नहीं कर सकते, तब हममें क्या और क्यों का विकास नहीं होता। सदन को घर से निकल भागना स्वीकार होता, इसके बदले कि वह घर की स्त्रियों को गंगा नहलाने ले जाय। अगर स्त्रियो की हँसी की आवाज कभी मरदाने में जाती तो वह तेवर बदले घर में आता और अपनी माँ को आड़े हाथों लेता। सुभद्रा ने अपनी सास का शासन भी ऐसा कठोर न पाया था। आत्मपतन को वह दार्शनिक की उदार दृष्टि से नहीं, शुष्क योगी की दृष्टि से देखता था। उसने देखा था कि उसके गाँव में एक ठाकुर ने एक बेड़िन बैठा ली थी तो सारे गाँव ने उनके द्वारपर आना जाना छोड़ दिया था और इस तरह उसके पीछे पड़े थे कि उसे विवश होकर बेड़िन को घर से निकालना पड़ा। नि:सन्देह वह सुमन बाई पर जान देता था, लेकिन उसके लौकिक शास्त्र में यह प्रेम उतना अक्षम्य न था जितना सुमन की परछाई का उसके घर में आ जाना। उसने अब तक सुमन के यहाँ पान तक न खाया था। वह अपनी कुल-मर्यादा और सामाजिक प्रथा को अपनी आत्मा से कहीं बढ़कर महत्व की वस्तु समझता था। उस अपमान और निन्दा की कल्पना ही उसके लिए असहय थी जो कुलटा स्त्री से सम्बन्ध हो जाने के कारण उसके कुल पर