पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१९७

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२२२ सेवासदन


उसकी आत्मा इतनी निर्बल है । संसार में किसके दिन समान होते है ? विपत्ति सभीपर आती है । बड़े-बड़े धनवानों की स्त्रियाँ अन्न वस्त्र को तरसती है पर कोई उनके मुखपर चिन्ता का चिन्ह भी नहीं देख सकता। वे रो रोकर दिन काटती है, कोई उनके आंसू नही देखता । वे किसी के सामने अपनी विपत्तिकी का नहीं कहती। वे मर जाती है पर किसीका एहसान सिरपर नही लेती। वे देवियाँ है। वे कुल मर्यादा के लिये जीती है और उसकी रक्षा करती हुई मरती है, पर यह दुष्टा, यह अभागिनी.... और उसका पति कैसा कायर है कि उसने उसका सिर नहीं काट डाला । जिस समय उसने घर से बाहर पैर निकाला, उसने क्यों उसका गला नहीं दबा दिया? मालूम होता है वह भी नीच, दुराचारी नामर्द है। उसने अपनी कुलमर्यादा का अभिमान होता तो यह नौबत न आती। उसे अपने अपमान की लाज न होगी पर मुझे हैं और में सुमन को इसका दण्ड दूँगा। जिन हाथों से उसे पाला, खिलाया, उन्ही हाथों से उसके गलेपर तलवार चलाऊँगा। यही आँखे कभी उसे खेलती देखकर प्रसन्न होती थी, अब उसे रक्त में लोटती देखकर तृप्त होगी। मिटी हुई मर्यादा पुनरुद्धार का इसके सिवाय कोई उपाय नहीं। संसार को मालूम हो जायगा कि कुल मर्य्यादा पर मरनेवाले पापाचरण का क्या दंड देते है ।

यह निश्चय करके कृष्णचन्द्र अपने उद्देश्य को पूरा करने के साधनों पर विचार करने लगे। जेलखाने में उन्होंने अभियुक्तों से हत्याकांड के कितने ही मन्त्र सीखे थे। रात दिन इन्ही बातों की चर्चाएंं रहती थी। उन्हें सबसे उत्तम साधन यही मालूम हुआ कि चलकर तलवार से उसको मारूँ और तब पुलिस में जाकर आपही इसकी खबर दूं मैजिस्ट्रेट के सामने मेरा जो बयान होगा उसे सुनकर लोगो को आँखें खुल जायगी। मन-ही-मन इस प्रस्ताव से पुलकित होकर वह उस बयान की रचना करने लगे। पहले कुछ सभ्य समाज की विलासिता की उल्लेख कहूंगा, तब पुलिस के हथकड़ी की कलई खोलूँगा, इसके पश्चात् वैवाहिक अत्याचारों का वर्णन करूंगा। दहेज प्रथा पर ऐसी चोट कहूंगा कि सुनकर लोग दंग रह जाय। पर