पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२१३

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२४२ सेवासदन


समान लगती थी। वह इतने दिनों तक सदन को अपना पति समझने बाद उसे हृदय से निकाल न सकती थी, चाहे वह उसकी बात पूछे या न पूछे, चाहे उसे अंगीकार करे या न करे।अगर द्वाराचार के बाद ही सदन उसके सामने आता तो वह उसी भाँति उससे मिलती मानो वह उसका पति हैं विवाह,भंवर या सेंदुर बंंधन नही, बंधन केवल मनका भाव है।

शान्ता को अभी तक यह आशा थी कि कभी न कभी में पति घर अवश्य जाऊंगी, कभी न कभी स्वामी के चरणो में अवश्य ही आश्रय पाऊँगी, पर आज अपने विवाहकी-या पुनर्विवाह की बात सुनकर उसका अनुरक्त हृदय काँप उठा। उसने निस्संकोच होकर जान्हवी से विनय की कि मुझे पति के घर भेज दो । यहीं तक उसकी सामर्थ्य थी। इसके सिवा वह और क्या करती? पर जान्हवी की निर्दयतापूर्ण उपेक्षा देखकर उसका धैर्य हाथसे जाता रहा। मनकी चंचलता बढने लगी । रात को जब सब सो गये तो उसने पद्मसिंह को एक विनय पत्र लिखना शुरू किया। यह उसका अंतिम साधन था। इसके निष्फल होने पर उसने कर्तव्य का निश्चय कर लिया था।

पत्र शीघ्र ही समाप्त हो गया। उसने पहले ही से कल्पना में उसकी रचना कर ली थी। केवल लिखना बाकी था-

“पूज्य धर्म पिता चरण-कमलों में सेविका शान्ता का प्रणाम स्वीकार हो। मैं बहुत दु:ख में हूं। मुझपर दया करके अपने चरणों में आश्रय दीजिये। पिताजी गंगा में डूब गये। यहां आप लोगो पर मुकदमा चलाने का प्रस्ताव हो रहा है मेरे पुनर्विवाह की बातचीत हो रही है। शीघ्र सुधि लीजिये। एक सप्ताह तक आपकी राह देखूंगी। उसके बाद फिर आप अबला की पुकार न सुनेंगे।’’

इतने में जान्हवी की आँख खुली। मच्छरो नेंं सारे शरीरमें कांटे चुभो दिये थें। खुजलाते हुए बोली,शान्ता! यह क्या कर रही है।

"शान्ताने निर्भय होकर कहापत्र लिख रही हूँ।”

"किसको ?”