पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२१४

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सेवासदन
२४३
 


"अपने श्वसुर को।”

"चुल्लू भर पानी में डूब नहीं मरती?”

"सातवे दिन मरुँगी।"

जान्हवी ने कुछ उत्तर न दिया, फिर सो गई। शान्ता ने लिफाफे पर पता लिखा और उसे अपने कपड़ो की गठरी में रखकर लेट रही।

४०

पद्मसिह का पहला विवाह उस समय हुआ था जब वह कालेज में पढ़ते थे और एफ० ए० पास हुए तो वह एक पुत्र के पिता थे। पर बालिका वधू शिशुपालन का मर्म न जानती थी। बालक जन्म के समय तो हृष्ट पुष्ट था पर पीछे धीरे-धीरे क्षीण होने लगा था। यहाँ तक कि छठे महीने माता ओर शिशु दोनो ही चल बसे। पद्मसिंहने निश्चय किया अब विवाह न करूँगा। मगर वकालत पास करने पर उन्हें फिर वैवाहिक बन्धन में फँसना पड़ा। सुभद्रा रानी वधू बनकर आई। इसे आज सात वर्ष हो गये।

पहले दो तीन साल तक तो पद्मसिह को सन्तान का ध्यान ही नही हुआ। यदि भामा इसकी चर्चा करती तो वह टाल जाते। कहते मुझे संतान की इच्छा नहीं। मुझसे यह बोझ न सँभलेगा। अभी तक सन्तान की आशा थी, इसलिये अधीर नहीं होते थे।

लेकिन जब चौथा साल भी यों ही कट गया तो उन्हे कुछ निराशा होने लगी। मन में चिंता उपस्थित हुई, क्या सचमुच में निस्सन्तान ही रहूँँगा? ज्यों ज्यों दिन गुजरते थे यह चिंता बढ़ती जाती थी। अब उन्हे अपना जीवन कुछ शून्य सा मालूम होने लगा सुभद्रा से वह प्रेम न रहा, सुभद्रा ने इसे ताड़ लिया। उसे दु:ख तो हुआ, पर इसे अपने कर्मो का फल समझकर उसने संतोष किया।

पद्मसिह अपने को बहुत समझाते कि तुम्हे सन्तान लेकर क्या करना हैं? जन्म से लेकर पचीस वर्ष की आयु तक उसे जिलाओ,खिलाओ,पढाओ तिसपर भी यह शंका ही लगी रहती है कि यह किसी ढंग की भी होगी या नही।