पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२१५

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२४६ सेवासदन


सिकल उबर फेर दी। वह शान्ता के विषय मे इसी समय कुछ न कुछ निश्चय कर लेना चाहते थे। उन्हें भय था कि कही विलव होने से यह जोश ठण्डा न पड़ जाय।

कुँवरसाहब के यहाँ ग्वालियर से एक जलतरंग बजानेवाला आया हुआ था। उसीका गाना सुनने के लिए आज उन्होने अपने मित्रों को निमंत्रित किया था। पद्मसिंह वहाँ पहुँचे तो विट्ठलदास और प्रोफेसर रमेशदत्त में उच्चस्वर से विवाद हो रहा था और कुंवरसाहब,पण्डित प्रभाकरराव तया सैयद तेगअली बैठे हुए बटेरो की इस लड़ाई का तमाशा देख रहे थे । शर्माजीको देखते ही कुँवरसाहब ने उनका स्वागत किया। बोले, आइये, आइये, देखिए यहाँ घोर संग्राम हो रहा है, किसी तरह इन्हें अलग कीजिये नही तो ये लड़ते-लड़ते मर जायेंगे।

इतने में प्रोफेसर रमेशदत्त बोले, थियासोफिस्ट होना कोई गाली नहीं है। मैं थियासोफिस्ट हूँ और इसे सारा शहर जानता है। हमारे ही समाजक उद्योग का फल है कि आज अमेरिका, जर्मनी ,रूस इत्यादि देशो में आापको राम और कृष्ण के भक्त और गीता, उपनिषद् आदि सदग्रन्थों के प्रेमी दिखाई देने लगे है। हमारे समाज ने हिन्दू जाति का गौरव बैठा दिया है उसके महत्व को प्रसारित कर दिया है और उसे उस उच्चासन पर बिठा दिया है जिसे वह अपनी अकर्मण्यता के कारण कई शताब्दियों से छोड़ बैठी थी। यह हमारी परस कृतघ्नता होगी अगर हम उन लोगों का यश न स्वीकार करें, जिन्होने अपने दीपक हमारे अन्धकार को दूर करके हमें वह रत्न दिखा दिये है जिन्हें देखने की हम सामर्थ्य न थी। वह दीपक व्लावेट्स्की का हो, या आल्कट का या किसी अन्य पुरुष का, हमे इससे कोई प्रयोजन नहीं। जिसने हमारा अन्धकार मिटाया हो उसका अनुग्रहीत होना हमारा कर्तव्य है, अगर आप इसे गुलामी कहते है तो यह आपका अन्याय है।

विट्ठठलदास ने इस कथन को ऐसे उपेक्ष्य भाव से सुना मानो वह कोई निरर्थक बकवाद है और बोले, इसी का नाम गुलामी है, बल्कि गुलाम तो