पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२१७

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२४८ सेवासदन


उन्नत ऐश्वर्यवान है तो बहुत गुलाम है, जो विदेशी भाषा बोलते है, कुत्तें पालते हैं और अपने देशवासियों को नीच समझते हैं, सारी जाति इन्हीं दो भाग में विभक्त है। इसलिये कोई किसी को गुलाम नही कह सकता। गुलामी के मानसिक, आत्मिक, शारीरिक आादि विभाग करना भ्रंतिकारक है। गुलामी केवल आत्मिक होती है, और दशाएँ इसी के अन्तर्गत है? मोटर बंगले, पोलो और प्यानो यह एक एक वेड़ी के तुल्य है। जिसने इन बेडियों को नही पहना उसी को सच्ची स्वाधीनता का आनन्द प्राप्त हो सकता है, और आप जानते है वह कौन लोग हैं? वह दीन कृषक है जो अपने पसीने की कमाई खाते है, अपने जातीय भेष, भाषा और भावका आदर करते है और किसी के सामने सिर नहीं झुकाते।

प्रभाकराव ने मुस्कराकर कहा, आपको कृपक बन जाना चाहिये।

कुंवर तो अपने पूर्वजन्म कुकर्मो को कैसे भोगूंगा? बड़े दिन में मेवे की डालियां कैसे लगाऊँगा? सलामी के लिये खानसामा की खुशा मद कैसे करुंगा? उपाधि के लिये नैनीताल के चक्कर कैसे लगाऊँगा? डिनर पार्टी देकर लेडियों कुत्तों को कैसे गोद में उठाऊँगा? देवताओं को प्रसन्न और संतुष्ट करने के लिये देशहित के कार्यों में असम्मति कैसे दूंगा? यह सब मानव अध पतन की अन्तिम अवस्थाएँ हैं। उन्हे भोग किये बिना मेरी मुक्ति नहीं हो सकती। (पद्मसिंह से) कहिये शर्माजी, आपका प्रस्ताव बोर्ड में कब आयेगा? आप आजकल कुछ उत्साहहीन से दीख पड़ते है। क्यों, इस प्रस्ताव को भी कहीं गति होगी जो हमारे अन्य सा सार्वजनिक कार्यों की हुआ करती है?

इधर कुछ दिनों से वास्तव में पद्मसिंह का उत्साह कुछ क्षीण हो गया था। ज्यो-ज्यों उसके पास होने को आशा बढ़ती थी, उनका अविश्वास भी बढ़ता जाता था, विद्यार्थी की परीक्षा जबतक नहीं होती वह उसी की तैयारी में लगा रहता है, लेकिन परीक्षायें उत्तीर्ण हो जाने के बाद भावी जीवन-संग्राम की चिन्ता उसे हतोत्साह कर दिया करती है। उसे अनुभव होता है कि जिन साधनों से अबतक मैंने सफलताा प्राप्त की है वह इस