पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२२४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
सेवासदन
२५७
 

पूरा हो गया,मै सो गया। थोड़ी देरमे जब उठा तो उन्हे वहाँ न देखा। तुरन्त गगातटकी ओर दौड़ा। उस समय मैंने सुना कि वह मुझे पुकार रहे है, पर जब तक मैं यह निश्चय कर सकूं कि वह कहां है उन्हे निर्दयी लहरोने ग्रस लिया! यह दुर्लभ आत्मा मेरी आंखोके सामने स्वर्गधामको सिवारी। तबतक मुझे मालूम न था कि मेरा पाप इतना घोरतम है वह अक्षम्य है, अदंडय है। मालूम नही, ईश्वरके यहां मेरी क्या गति होगी?

गजाधरकी आत्मवेदनाने सुमनके हृदयपर वही काम किया, जो साबुन मैलके साथ करता है। उसने जमे हुए मालिन्यको काटकर ऊपर कर दिया। वह सचित भाव ऊपर आ गये जिन्हे वह गुप्त रखना चाहती थी। बोली, परमात्माने तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान कर दी है। तुम अपनी सुकीर्तिसे चाहे कुछ कर भी लो, पर मेरी क्या गति होगी, मै तो दोनो लोकोसे गई। हाय! मेरी विलास-तृष्णाने मुझे कहीका न रखा। अब क्या छिपाऊँ, तुम्हारे दारिद्रय और इससे अधिक तुम्हारे प्रेमविहीन व्यवहारने मुझमे असतोषका अकुर जमा दिया और चारो ओर पाप जीवनकी मान मर्यादा, सुख विलास देखकर इस अकुरने बढते-बढ़ते भटकटैय के सदृश सारे हृदयको छा लिया। उस समय एक फफोलेको फोड़ने लिये जरासी ठेस भी बहुत थी। तुम्हारी नम्रता, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी सहानुभूति, तुम्हारी उदारता उस फफोलेपर फहेका काम देती, पर तुमने उसे मसल दिया, मे पीडासे व्याकुल, सशाहीन हो गई। तुम्हारे उस पाशविक पैशाचिक व्यवहारका जब स्मरण होता है तो हृदय में एक ज्वालासी दहकने लगती है और अन्त. करण से तुम्हारे प्रति शाप निकल आता है। यह मेरा अतिम समय है, एक क्षणमे यह पापमय शरीर गगामे डूब जायगा, पिताजीकी शरणमे पहुँच जाऊंगी, इसलिये ईश्वरसे प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हारे अपराधोको क्षमा कर ।

गजाधर ने चितित स्वर मे कहा, सुमन, यदि प्राण देने से पापो का प्रायश्चित्त हो जाता तो मे अबतक कभी प्राण दे चुका होता।