पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२२९

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२६२ सेवासदन

जब गाडी चली तो पद्मसिंहने विट्लदाससे कहा, अब इस अभि- नयका सबसे कठिन भाग आ गया।

बिट्ठल——मैं नही समझा।

पद्म——क्या शान्ता से कुछ कहे सुने बिना ही उसे आश्रम में पहुँचा दीजियेगा । उसे पहले उसके लिये तैयार करना चाहिये ।

विट्ठल——हाँ, यह आपने ठीक सोचा, तो जाकर कह दूँ ?

पद्म——जरा सोच तो लीजिये, क्या कहियेगा ? अभी तो वह यह समझ रही है कि ससुराल में जरही हूँ । वियोगके दु:ख मे यह आशा उसे सँभाले हुए है। । लेकिन जब उसे हमारा कौशल ज्ञात हो जायगा तो उसे कितना दुःख होगा?मुझे पछतावा हो रहा है कि मैने पहले ही वे बाते क्यों न कह दी ?

विट्ठल——तो अब कहने में क्या बिगडा जाता है ? मिर्जापुर में गाडी देर तक ठहरेगी, मैं जाकर उसे समझा दूंगा।

पद्म——मुझसे बडी भूल हुई ।

विट्ठल——तो उस भूलपर पछताने से अगर काम चल जाय तो जी भरकर पछता लीजिये ।

पद्म——आपके पास पेन्सिल हो तो लाइये, एक पत्र लिखकर सब समाचार प्रकट कर दुं।

विट्ठल——नहीं तार दे दीजिये, यह और भी उत्तम होगा । आप विचित्र जीव है, सीधी-सी बात में भी इतना आगा पीछा करने लगते है ।

पद्म—— समस्या ही ऐसी आ पडी है, मैं क्या करुँ ? एक बात मेरे ध्यान में आती है, मुगलसराय में देरतक रुकना पड़ेगा, बस वही उसके पास जाकर सब वृत्तांत कह दूंगा ।

विट्ठल——यह आप बहुत दूर की कौड़ी लाये, इसलिये बुद्धिमानो ने कहा है कि कोई काम बिना भली भांति सोचे नही करना चाहिये । आपकी वृद्धि ठिकाने पर पहुंचती है, लेकिन बहुत चक्कर खाकर । यही बात आपको पहले न सूझी।