पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२२८

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सेवासदन
२६१
 


शान्ता का हृदय प्रेम से परिपूर्ण था, इस पर उसे जो जो कष्ट उठाने पड़े थे वह इस समय भूल गये थे। इन लोगों से फिर भेट न होगी इस घर के अब फिर दर्शन न होंगे, इनसे सदैव के लिये नाता टूटता है, यह सोचकर उसका हृदय विदीर्ण हुआ जाता था। जान्हवी का हृदय भी दया से भरा हुआ था। इस माता-पिता विहीन बालिका को हमने बहुत कष्ट दिये यह सोचकर वह अपने आँसुओंको न रोक सकती थी। दोनों के हृदय में सच्चे, निर्मल, कोमल भावो की तरंगे उठ रही थी।

उमानाथ घर में आये तो शान्ता उनके पैरो से लिपट गई और विनय करती हुई कहने लगी, तुम्हीं मेरे पिता हो, अपनी बेटी को भूल न जाना, मेरी बहनों को गहने-कपड़े देना, होली और तीज में उन्हें बुलाना, पर मैं तुम्हारे दो अक्षरो के पत्र को ही अपना धन्यभाग्य समझूँगी। उमानाथ ने उसको संबोधन करते हुए कहा, बेटी, जैसी मेरी और दो बेटियाँ हैं। वैसी हो तुम भी हो, परमात्मा तुम्हें सदा सुखी रखे। यह कह कर रोने लगे।

सन्ध्या का समय था, मुन्नी गाय घर में आई तो शान्ता उसके गले लिपटकर रोने लगी। उसने तीन-चार वर्ष उस गाय की सेवा की थी। अब वह किसे भूसी लेकर दौड़गी? किसके गले में काले डोरे में कौड़ियाँ गूथकर पहनावेगी? मुन्नी सिर झुकाये उसके हाथो को चाटती थी। उसका वियोग दुख उसकी आँखों से झलक रहा था।

जान्हवी ने शान्ता को लाकर पालकी में बैठा दिया, कहारोने पालकी उठाई। शान्ता को ऐसा मालूम हुआ कि मानों वह अथाह सागर मे वहीं जा रही है।

गाँव की स्त्रियाँ अपने द्वारों पर खड़ी पालकी को देखती थी और रोती थीं।

उमानाथ स्टेशन तक पहुँचाने आये। चलते समय अपनी पगड़ी उताकर उन्होंने पद्मसिंह पौरो पर रख दी। पद्मसिंह ने उनको गले से लगा लिया।