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सेवासदन
 


समझती थीं । पति, चाहे जैसे हो, अपनी स्त्री को सुन्दर आभूषणो से. उत्तम वस्त्रों से सजावे, उसे स्वादिष्ट पदार्थ खिलावे । यदि उसमें वह सामर्थ्य नहीं है तो वह निखट्टू है, अपाहिज है, उसे विवाह करने का कोई अधिकार नही था, वह आदर और प्रेम के योग्य नही । सुमन ने भी यही शिक्षा प्राप्त की और गजाधर प्रसाद जब कभी उसके किसी काम से नाराज होते तो उन्हें पुरुषो के कर्त्तव्य पर एक लम्बा उपदेश सुनना पडता था।

उस मुहल्ले में रसिक युवकों तथा शोहदोकी भी कमी न थी। स्कूल से आते हुए युवक सुमन के द्वार की ओर टकटकी लगाते हुए चले जाते । शोहदे उधर से निकलते तो राधा और कान्हा के गीत गाने लगते । सुमन कोई काम करती हो, पर उन्हें चिककी आड़से एक झलक दिखा देती । उसके चञ्चल हृदय को इस ताक-झाँक मे असीम आनन्द प्राप्त होता था। किसी कुवासनासे नही, केवल अपनी यौवन की छटा दिखाने के लिए केवल दूसरो के हृदयपर विजय पाने के लिए वह यह खेल खेलती थी।

सुमन के घर के सामने भोली नामकी एक वेश्या का मकान था । भोली नित नये सिंगार करके अपने कोठे के छज्जेपर बैठती । पहर रात तक उसके कमरे से मधुर गान की ध्वनि आया करती । कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया करती । सुमन उसे घृणा की दृष्टि से देखती थी।

सुमन ने सुन रखा था कि वेश्याएं अत्यन्त दुश्चरित्र और कुलटा होती है । वह अपने कौशल से नवयुवको को अपने मायाजाल में फंसा लिया करती है । कोई भलामानुस उनसे बातचीत नही करता, केवल शोहदे रात को छिपकर उनके यहाँ जाया करते है । भोली ने कई बार उसे चिककी आड़ में खड़े देखकर इशारे से बुलाया था, पर सुमन उससे बोलने मे अपना अपमान समझती। वह अपने को उससे बहुत श्रेष्ठ समझती थी। मैं दरिद्र सही, दीन सही पर अपनी मर्यादा पर दृढ़